Sunday, 27 November 2016

ज्योतिष व शास्त्रो के अनुसार नौ आदते आपके जीवन में अवशय होनी चाईए – पढ़े और सभी को बताए

ज्योतिष व शास्त्रो के अनुसार नौ आदते आपके जीवन में अवशय होनी चाईए – पढ़े और सभी को बताए

१)::
अगर आपको कहीं पर भी थूकने की आदत है तो यह निश्चित है
कि आपको यश, सम्मान अगर मुश्किल से मिल भी जाता है तो कभी टिकेगा ही नहीं . wash basin में ही यह काम कर आया करें ! यश,मान-सम्मान में अभिवृध्दि होगी।

२)::
जिन लोगों को अपनी जूठी थाली या बर्तन वहीं उसी जगह पर छोड़ने की आदत होती है उनको सफलता कभी भी स्थायी रूप से नहीं मिलती.!
बहुत मेहनत करनी पड़ती है और ऐसे लोग अच्छा नाम नहीं कमा पाते.! अगर आप अपने जूठे बर्तनों को उठाकर उनकी सही जगह पर रख आते हैं तो चन्द्रमा और शनि का आप सम्मान करते हैं ! इससे मानसिक शांति बढ़ कर अड़चनें दूर होती हैं।

३)::
जब भी हमारे घर पर कोई भी बाहर से आये, चाहे मेहमान हो या कोई काम करने वाला, उसे स्वच्छ पानी ज़रुर पिलाएं !
ऐसा करने से हम राहु का सम्मान करते हैं.!
जो लोग बाहर से आने वाले लोगों को हमेशा स्वच्छ पानी  पिलाते हैं उनके घर में कभी भी राहु का दुष्प्रभाव नहीं पड़ता.! अचानक आ पड़ने वाले कष्ट-संकट नहीं आते।

४)::
घर के पौधे आपके अपने परिवार के सदस्यों जैसे ही होते हैं, उन्हें भी प्यार और थोड़ी देखभाल की जरुरत होती है.!
जिस घर में सुबह-शाम पौधों को पानी दिया जाता है तो हम बुध, सूर्य और चन्द्रमा का सम्मान करते हुए परेशानियों का डटकर सामना कर पाने का सामर्थ्य आ पाता है ! परेशानियां दूर होकर सुकून आता है।
जो लोग नियमित रूप से पौधों को पानी देते हैं, उन लोगों को depression, anxiety जैसी परेशानियाँ नहीं पकड़ पातीं.!

५)::
जो लोग बाहर से आकर अपने चप्पल, जूते, मोज़े इधर-उधर फैंक देते हैं, उन्हें उनके शत्रु बड़ा परेशान करते हैं.!
इससे बचने के लिए अपने चप्पल-जूते करीने से लगाकर रखें, आपकी प्रतिष्ठा बनी रहेगी।

६)::
उन लोगों का राहु और शनि खराब होगा, जो लोग जब भी अपना बिस्तर छोड़ेंगे तो उनका बिस्तर हमेशा फैला हुआ होगा, सिलवटें ज्यादा होंगी, चादर कहीं, तकिया कहीं, कम्बल कहीं ?
उसपर ऐसे लोग अपने पुराने पहने हुए कपडे़ तक फैला कर रखते हैं ! ऐसे लोगों की पूरी दिनचर्या कभी भी व्यवस्थित नहीं रहती, जिसकी वजह से वे खुद भी परेशान रहते हैं और दूसरों को भी परेशान करते हैं.!
इससे बचने के लिए उठते ही स्वयं अपना बिस्तर समेट दें.! जीवन आश्चर्यजनक रूप से सुंदर होता चला जायेगा।

७)::
पैरों की सफाई पर हम लोगों को हर वक्त ख़ास ध्यान देना चाहिए, जो कि हम में से बहुत सारे लोग भूल जाते हैं ! नहाते समय अपने पैरों को अच्छी तरह से धोयें, कभी भी बाहर से आयें तो पांच मिनट रुक कर मुँह और पैर धोयें.!
आप खुद यह पाएंगे कि आपका चिड़चिड़ापन कम होगा, दिमाग की शक्ति बढे़गी और क्रोध
धीरे-धीरे कम होने लगेगा.! आनंद बढ़ेगा।

८)::
रोज़ खाली हाथ घर लौटने पर धीरे-धीरे उस घर से लक्ष्मी चली जाती है और उस घर के सदस्यों में नकारात्मक या निराशा के भाव आने लगते हैं.!
इसके विपरीत घर लौटते समय कुछ न कुछ वस्तु लेकर आएं तो उससे घर में बरकत बनी रहती है.!
उस घर में लक्ष्मी का वास होता जाता है.! हर रोज घर में कुछ न कुछ लेकर आना वृद्धि का सूचक माना गया है.!
ऐसे घर में सुख, समृद्धि और धन हमेशा बढ़ता जाता है और घर में रहने वाले सदस्यों की भी तरक्की होती है.!

९)..
जूठन बिल्कुल न छोड़ें । ठान लें । एकदम तय कर लें। पैसों की कभी कमी नहीं होगी।
अन्यथा नौ के नौ गृहों के खराब होने का खतरा सदैव मंडराता रहेगा। कभी कुछ कभी कुछ । करने के काम पड़े रह जायेंगे और समय व पैसा कहां जायेगा पता ही नहीं चलेगा।

अच्छी बातें बाँटने से दोगुनी तो होती ही हैं
– अच्छी बातों का महत्त्व समझने वालों में आपकी इज़्जत भी बढ़ेगी
9910057645

नवग्रह शान्ति मन्त्र ( ग्रहों के कुप्रभाव को शांत करने के लिए मंत्र )

नवग्रह शान्ति मन्त्र ( ग्रहों के कुप्रभाव को शांत करने के लिए मंत्र )
सूर्य ग्रह की शांति के लिए आप शुक्ल पक्ष के रविवार से उपवास आरंभ कर सकते हैं। रविवार को नमक का सेवन नहीं करना चाहिए और गेहूं की रोटी व गुड़ से अथवा गुड़ से बने दलिया का सेवन करना चाहिए। साथ ही पांच माला सूर्य के बीज मंत्र का जप करें,
ॐ हृं हृं स: सूर्याय नम:।
चंद्रमा की शांति के लिए आप श्रावण, चैत्र, वैशाख, कार्तिक अथवा मार्गशीर्ष महीने के शुक्ल पक्ष के सोमवार से उपवास आरंभ कर सकते हैं। इसके अलावा प्रतिदिन “ॐ नम: शिवाय” मंत्र का जप पांच माला करें। सोमवार के दिन पांच माला चंद्रमा के बीज मंत्र का भी जप करना चाहिए। इस दिन शिव-पार्वती पर श्वेत पुष्प, सुपारी, अक्षत, बिल्व पत्र आदि चढ़ाकर ग्रह शांति की प्रार्थना करें।
ऊं श्रां श्रीं श्रौं स: चंद्रमसे नम
मंगल ग्रह की शांति के लिए मंगलवार को उपवास करना चाहिए। यह व्रत 21 सप्ताह तक करने से पूर्ण फल मिलता है। इस दिन नमक छोड़ दें और लाल पुष्प, फल, ताम्र बर्तन, नारियल आदि द्वारा हनुमान जी की पूजन करके उन्हें सिंदूर अर्पित करना चाहिए तथा लाल चंदन की माला से पांच माला यह मंत्र जपे।
ॐ क्रां क्रीं क्रौं स: भौमाय नम:
बुध की शांति के लिए लिए बुधवार का उपवास रखना चाहिए और भगवान विष्णु की पूरे विधि-विधान से पूजा करनी चाहिए। अगर आप 21 या 31 बुधवार के व्रत का संकल्प लें, तो बेहतर होगा। व्रत के दिन श्री विष्णु सहस्रनाम का पांच या ग्यारह बार पाठ करें। यह पाठ प्रतिदिन पांच बार ही करना श्रेयस्कर माना गया है। घी, मूंग की दाल से बने पदार्थ से बुधवार को परहेज करें और इस मंत्र की पाँच माला जपे।
ॐ ब्रां ब्रीं ब्रौं स: बुधाय नम:
गुरु या बृहस्पति की शांति के लिए शुक्ल पक्ष के प्रथम गुरुवार से उपवास आरंभ किया जाए, तो उपासक की मनोकामना अवश्य पूर्ण होती है। व्रत के दिन स्नानादि के बाद पीले वस्त्र धारण करके पीले फूल, पीला नैवेद्य, गुड़, चने की दाल, हल्दी या पीले चंदन से सत्यनारायण भगवान की आराधना करें। साथ ही इस मंत्र का पांच माला जप करें।
ॐ ग्रां ग्रीं ग्रौं स: गुरुवे नम:
शुक्र की शांति के लिए उपवास लक्ष्मी या वैभव लक्ष्मी के समक्ष श्वेत चंदन, श्वेत पुष्प, मावा की मिठाई, दीया, धूप आदि से पूजन करें और इस मंत्र का जप करें। यह व्रत 21 शुक्रवार तक करने तथा प्रतिदिन श्रीसूक्त का पाठ करने से लाभ होता है
ऊं द्रां द्रीं द्रौं स: शुक्राय नम:
शनि ग्रह की शांति के लिए: शुक्ल पक्ष के प्रथम शनिवार से यह उपवास आरंभ किया जा सकता है। 11 या 21 शनिवार तक व्रत करें, तो लाभप्रद होगा। इस दिन स्नान से पहले अपने ऊपर से 20-25 ग्राम सरसों या तिल के तेल में काले तिल डालकर सात बार सिर से पांव तक उतार लें और शनिदेव पर अर्पित करें। इसके बाद स्नान करके नीले वस्त्र पहनें। लौह निर्मित शनि प्रतिमा पर पंचामृत से स्नान कराएं तथा इस मंत्र का जप करें।
ॐ शं शनैश्चराय नम:
राहु की शांति के लिए: यह छाया ग्रह है, इसलिए इसके लिए कोई रात या दिन नहीं होता। राहु का उपवास शनिवार को ही करना चाहिए। इस दिन या प्रतिदिन पक्षियों को बाजरा खिलाएं और राहु मंत्र का 21 बार उच्चारण करें। साथ ही इस मंत्र का जप करें।
ॐ भ्रां भ्रीं भ्रौं स: राहवे नम:
केतु की शांति के लिए: यह भी एक छाया ग्रह है, इसलिए इसकी कोई राशि या दिन नहीं होता। विद्वानों के अनुसार केतु मंगल के समान ही है। इसलिए इसका व्रत भी मंगलवार को ही करना चाहिए। इस दिन नमक रहित भोजन करें और बीज मंत्र का जप करें।
ॐ स्रां स्रीं स्रौं स: केतवे नम:
अशांत ग्रह को शांत करने के लिए सामान्य गृहस्थों के लिए कठोर तप के विकल्प के रूप में उपवास का विधान शास्त्रों में बताया गया है, जिससे वह किसी ग्रह की भी उपासना कर सकते हैं

Tuesday, 22 November 2016

श्री गणपत्यथर्वशीर्ष

श्री गणपत्यथर्वशीर्ष ॥
॥ शान्ति पाठ ॥
ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवाः । भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः ॥
स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवांसस्तनूभिः । व्यशेम देवहितं यदायुः ॥
ॐ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः । स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः ॥
स्वस्तिनस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः । स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥
ॐ तन्मामवतु तद् वक्तारमवतु अवतु माम् अवतु वक्तारम्
ॐ शांतिः । शांतिः ॥ शांतिः॥।

॥ उपनिषत् ॥
॥हरिः ॐ नमस्ते गणपतये ॥
त्वमेव प्रत्यक्षं तत्त्वमसि। त्वमेव केवलं कर्ताऽसि। त्वमेव केवलं धर्ताऽसि। त्वमेव केवलं हर्ताऽसि। त्वमेव सर्वं खल्विदं ब्रह्मासि। त्वं साक्षादात्माऽसि नित्यम् ॥ १॥
गणपति को नमस्कार है, तुम्हीं प्रत्यक्ष तत्त्व हो, तुम्हीं केवल कर्त्ता, तुम्हीं केवल धारणकर्ता और तुम्हीं केवल संहारकर्ता हो, तुम्हीं केवल समस्त विश्वरुप ब्रह्म हो और तुम्हीं साक्षात् नित्य आत्मा हो।

॥ स्वरूप तत्त्व ॥
ऋतं वच्मि (वदिष्यामि)॥ सत्यं वच्मि (वदिष्यामि)॥ २॥
यथार्थ कहता हूँ। सत्य कहता हूँ।

अव त्वं माम् । अव वक्तारम् । अव श्रोतारम् । अव दातारम् । अव धातारम् । अवानूचानमव शिष्यम् । अव पश्चात्तात् । अव पुरस्तात् । अवोत्तरात्तात् । अव दक्षिणात्तात् । अव चोर्ध्वात्तात्। अवाधरात्तात्। सर्वतो मां पाहि पाहि समंतात् ॥३॥
तुम मेरी रक्षा करो। वक्ता की रक्षा करो। श्रोता की रक्षा करो। दाता की रक्षा करो। धाता की रक्षा करो। षडंग वेदविद् आचार्य की रक्षा करो। शिष्य रक्षा करो। पीछे से रक्षा करो। आगे से रक्षा करो। उत्तर (वाम भाग) की रक्षा करो। दक्षिण भाग की रक्षा करो। ऊपर से रक्षा करो। नीचे की ओर से रक्षा करो। सर्वतोभाव से मेरी रक्षा करो। सब दिशाओं से मेरी रक्षा करो। 
त्वं वाङ्ग्मयस्त्वं चिन्मयः। त्वमानंदमयस्त्वं ब्रह्ममयः। त्वं सच्चिदानंदाद्वितीयोऽसि। त्वं प्रत्यक्षं ब्रह्मासि। त्वं ज्ञानमयो विज्ञानमयोऽसि ॥४॥
तुम वाङ्मय हो, तुम चिन्मय हो। तुम आनन्दमय हो। तुम ब्रह्ममय हो। तुम सच्चिदानन्द अद्वितीय परमात्मा हो। तुम प्रत्यक्ष ब्रह्म हो। तुम ज्ञानमय हो, विज्ञानमय हो।
सर्वं जगदिदं त्वत्तो जायते। सर्वं जगदिदं त्वत्तस्तिष्ठति। सर्वं जगदिदं त्वयि लयमेष्यति। सर्वं जगदिदं त्वयि प्रत्येति। त्वं भूमिरापोऽनलोऽनिलो नभः। त्वं चत्वारि वाक्पदानि ॥ ५॥
यह सारा जगत् तुमसे उत्पन्न होता है। यह सारा जगत् तुमसे सुरक्षित रहता है। यह सारा जगत् तुममें लीन होता है। यह अखिल विश्व तुममें ही प्रतीत होता है। तुम्हीं भूमि, जल, अग्नि और आकाश हो। तुम्हीं परा, पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी चतुर्विध वाक् हो।

त्वं गुणत्रयातीतः त्वमवस्थात्रयातीतः। त्वं देहत्रयातीतः। त्वं कालत्रयातीतः। त्वं मूलाधारः स्थिथोऽसि नित्यम्। त्वं शक्तित्रयात्मकः। त्वां योगिनो ध्यायंति नित्यम्। त्वं ब्रह्मा त्वं विष्णुस्त्वं रुद्रस्त्वं इन्द्रस्त्वं अग्निस्त्वं वायुस्त्वं सूर्यस्त्वं चंद्रमास्त्वं ब्रह्मभूर्भुवःस्वरोम् ॥ ६॥
तुम सत्त्व-रज-तम-इन तीनों गुणों से परे हो। तुम भूत-भविष्य-वर्तमान-इन तीनों कालों से परे हो। तुम स्थूल, सूक्ष्म और कारण- इन तीनों देहों से परे हो। तुम नित्य मूलाधार चक्र में स्थित हो। तुम प्रभु-शक्ति, उत्साह-शक्ति और मन्त्र-शक्ति- इन तीनों शक्तियों से संयुक्त हो। योगिजन नित्य तुम्हारा ध्यान करते हैं। तुम ब्रह्मा हो। तुम विष्णु हो। तुम रुद्र हो। तुम इन्द्र हो। तुम अग्नि हो। तुम वायु हो। तुम सूर्य हो। तुम चन्द्रमा हो। तुम (सगूण) ब्रह्म हो, तुम (निर्गुण) त्रिपाद भूः भुवः स्वः एवं प्रणव हो।

॥ गणेश मंत्र ॥
गणादिं पूर्वमुच्चार्य वर्णादिं तदनंतरम्।अनुस्वारः परतरः। अर्धेन्दुलसितम्। तारेण ऋद्धम्। एतत्तव मनुस्वरूपम्। गकारः पूर्वरूपम्। अकारो मध्यमरूपम्। अनुस्वारश्चान्त्यरूपम्। बिन्दुरुत्तररूपम्। नादः संधानम्। संहितासंधिः। सैषा गणेशविद्या। गणकऋषिः। निचृद्गायत्रीच्छंदः। गणपतिर्देवता। ॐ गं गणपतये नमः ॥ ७॥
‘गण’ शब्द के आदि अक्षर गकार का पहले उच्चारण करके अनन्तर आदिवर्ण अकार का उच्चारण करें। उसके बाद अनुस्वार रहे। इस प्रकार अर्धचन्द्र से पहले शोभित जो ‘गं’ है, वह ओंकार के द्वारा रुद्ध हो, अर्थात् उसके पहले और पीछे भी ओंकार हो। यही तुम्हारे मन्त्र का स्वरुप (ॐ गं ॐ) है। ‘गकार’ पूर्वरुप है, ‘अकार’ मध्यमरुप है, ‘अनुस्वार’ अन्त्य रुप है। ‘बिन्दु’ उत्तररुप है। ‘नाद’ संधान है। संहिता’ संधि है। ऐसी यह गणेशविद्या है। इस विद्या के गणक ऋषि हैं। निचृद् गायत्री छन्द है और गणपति देवता है। मन्त्र है- ‘ॐ गं गणपतये नमः”

॥ गणेश गायत्री ॥
एकदंताय विद्महे वक्रतुण्डाय धीमहि तन्नो दंतिः प्रचोदयात् ॥ ८॥
एकदन्त को हम जानते हैं, वक्रतुण्ड का हम ध्यान करते हैं। दन्ती हमको उस ज्ञान और ध्यान में प्रेरित करें।

॥ गणेश रूप (ध्यानम्)॥
एकदंतं चतुर्हस्तं पाशमंकुशधारिणम् ॥
रदं च वरदं हस्तैर्बिभ्राणं मूषकध्वजम् ॥
रक्तं लंबोदरं शूर्पकर्णकं रक्तवाससम् ॥
रक्तगंधानुलिप्तांगं रक्तपुष्पैः सुपूजितम् ॥
भक्तानुकंपिनं देवं जगत्कारणमच्युतम् ॥
आविर्भूतं च सृष्ट्यादौ प्रकृतेः पुरुषात्परम् ॥
एवं ध्यायति यो नित्यं स योगी योगिनां वरः ॥ ९॥
गणपतिदेव एकदन्त और चर्तुबाहु हैं। वे अपने चार हाथों में पाश, अंकुश, दन्त और वरमुद्रा धारण करते हैं। उनके ध्वज में मूषक का चिह्न है। वे रक्तवर्ण, लम्बोदर, शूर्पकर्ण तथा रक्तवस्त्रधारी हैं। रक्तचन्दन के द्वारा उनके अंग अनुलिप्त हैं। वे रक्तवर्ण के पुष्पों द्वारा सुपूजित हैं। भक्तों की कामना पूर्ण करने वाले, ज्योतिर्मय, जगत् के कारण, अच्युत तथा प्रकृति और पुरुष से परे विद्यमान वे पुरुषोत्तम सृष्टि के आदि में आविर्भूत हुए। इनका जो इस प्रकार नित्य ध्यान करता है, वह योगी योगियों में श्रेष्ठ है।

॥ अष्ट नाम गणपति ॥
नमो व्रातपतये । नमो गणपतये । नमः प्रमथपतये । नमस्तेऽस्तु लंबोदरायैकदंताय । विघ्ननाशिने शिवसुताय । श्रीवरदमूर्तये नमो नमः ॥ १०॥
व्रातपति, गणपति, प्रमथपति, लम्बोदर, एकदन्त, विघ्ननाशक, शिवतनय तथा वरदमूर्ति को नमस्कार है।

Sunday, 6 November 2016

प्रतिदिन सोने से पूर्व पढें दो लाइनों की श्री कृष्ण की यह अतिसरल प्रार्थना – मिलेगी सभी क्लेशों से मुक्ति


प्रतिदिन सोने से पूर्व पढें दो लाइनों की श्री कृष्ण की यह अतिसरल प्रार्थना – मिलेगी सभी क्लेशों से मुक्ति

भगवान श्री कृष्ण भक्त वत्सल हैं श्रद्धा भाव से की गयी सभी प्रार्थनाएं वे अवश्य  स्वीकार करते हैं और अपने भक्तों के सभी कष्टों का नाश करते हैं। आप भी प्रतिदिन सोने से पूर्व भगवान श्री कृष्ण की यह अतिसरल और अतिफलदाई प्रार्थना पढ़के सभी कष्टों से छुटकारा पा सकते हैं।  प्रार्थना इस प्रकार है :-

कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने l

प्रणत क्लेश नाशाय गोविन्दाय नमो नमः ll

अर्थ :- “हे श्री कृष्ण, हे वासुदेव (वसुदेवके पुत्र ) हे हरि, हे परमात्मन, हे गोविंद, आपको नमन है , मेरे सारो क्लेश का नाश करें, हम आपके शरणागत हैं। “

कमल गट्टे से उपाय


कमल गट्टे से उपाय
1- यदि रोज 108 कमल के बीजों से आहुति दें और ऐसा 21 दिन तक करें तो आने वाली कई पीढिय़ां सम्पन्न बनी रहती हैं।
2- यदि दुकान में कमल गट्टे की माला बिछाकर उसके ऊपर भगवती लक्ष्मी का चित्र स्थापित किया जाए तो व्यापार में कमी आ ही नहीं सकती। कमल गट्टे से उपायव्यापार निरंतर उन्नति की ओर अग्रसर होता रहता है।
3- कमल गट्टे की माला भगवती लक्ष्मी के चित्र पर पहना कर किसी नदी या तालाब में विसर्जित करें तो घर में निरंतर लक्ष्मी का आगमन बना रहता है।
4- जो व्यक्ति प्रत्येक बुधवार को 108 कमलगटटे के बीज लेकर घी के साथ एक-एक करके अग्नि में 108 आहुतियां देता है। उसके घर से दरिद्रता हमेशा के लिए चली जाती है।
5- जो व्यक्ति कमल गट्टे की माला अपने गले में धारण करता है। उस पर लक्ष्मी की कृपा सदा बनी रहती है।

लघु नारियल

लघु नारियल
लघु नारियल के कुछ उपाय
1- 11 लघु नारियल को मां लक्ष्मी के चरणों में रखकर
"ऊँ महालक्ष्म्यै च विद्महे विष्णुपत्नीं च धीमहि तन्नो लक्ष्मी प्रचोदयात्"
मंत्र का जप करें। 2 माला जप करने के बाद एक लाल कपड़े में उन लघु नारियलों को लपेट कर तिजोरी में रख दें व दीपावली के दूसरे दिन किसी नदी या तालाब में विसर्जित कर दें। ऐसा करने से लक्ष्मी चिरकाल तक घर में निवास करती है।
2- धन, वैभव व समृद्धि पाने के लिए 5 लघु नारियल स्थापित कर, उस पर केसर से तिलक करें और हर नारियल पर तिलक करते समय 27 बार नीचे लिखे मंत्र का मन ही मन जप करते रहें-
मंत्र- ऐं ह्लीं श्रीं क्लीं
3- अगर आप चाहते हैं कि आपके घर में कभी धन-धान्य की कमी न रहे और अन्न का भंडार भरा रहे तो
11 लघु नारियल एक पीले कपड़े में बांधकर रसोई घर के पूर्वी कोने में बांध दें।

मुख्यद्वार पर शुभ-लाभ क्यों लिखते हैं?


मुख्यद्वार पर शुभ-लाभ क्यों लिखते हैं?
किसी भी पूजन कार्य का शुभारंभ बिना स्वस्तिक के नहीं किया जा सकता। हमारे यहां मुख्यद्वार पर स्वस्तिक के आसपास शुभ-लाभ लिखने की परंपरा है क्योंकि शास्त्रों के अनुसार श्री गणेश प्रथम पूजनीय हैं और शुभ व लाभ यानी शुभ व क्षेम को उनके पुत्र माना गया है। कहते हैं जहां शुभ होता है वहां हर काम में फायदा यानी लाभ अपने आप होने लगता है या जहां हर कार्य में लाभ होता है वहां सबकुछ अपने आप शुभ होने लगता है।
इसीलिए वास्तुशास्त्र के अनुसार ऐसी मान्यता है कि घर के मुख्य द्वार पर स्वस्तिक बनाकर शुभ-लाभ लिखने से घर में हमेशा सुख-समृद्धि बनी रहती है। ऐसे घर में हमेशा गणेशजी कृपा रहती है और धन-धान्य की कमी नहीं होती।
साथ ही स्वस्तिक के साथ ही शुभ-लाभ का चिन्ह भी धनात्मक ऊर्जा का प्रतीक है, इसे बनाने से हमारे आसपास से नकारात्मक ऊर्जा दूर हो जाती है। इसलिए स्वस्तिक के चिन्ह के साथ ही हर-त्यौहार पर घर के मुख्यद्वार पर सिन्दूर से शुभ-लाभ लिखा जाता है। जिससे घर पर किसी की बुरी नजर नहीं लगती और घर में सकारात्मक वातावरण बना रहता है। इसी वजह से मुख्यद्वार पर स्वस्तिक बनाने व शुभ-लाभ लिखने की परंपरा बनाई गई।