Saturday, 3 December 2016

ग्रहो के प्रभाव से होने वाली बीमारियां*

🌻 *ग्रहो के प्रभाव से होने वाली बीमारियां* 🌻

✍ आयुर्वेद के अनुसार मनुष्य के जीवन पर ग्रहों का सकारात्मक और नकारात्मक दोनों प्रकार का असर होता है, आज थोड़ी चर्चा ग्रहो के ख़राब होने से होने वाली बिमारियों पर...

1. *बृहस्पति* : पेट की गैस और फेफड़े की बीमारियाँ।
2. *सूर्य* : मुँह में बार-बार थूक इकट्ठा होना, झाग निकलना, धड़कन का अनियंत्रित होना, शारीरिक कमजोरी और रक्त चाप।
3. *चंद्र :* दिल और आँख की कमजोरी।
4. *शुक्र :* त्वचा, दाद, खुजली का रोग।
5. *मंगल :* रक्त और पेट संबंधी बीमारी, नासूर, जिगर, पित्त आमाशय, भगंदर और फोड़े होना।
6. *बुध :* चेचक, नाड़ियों की कमजोरी, जीभ और दाँत का रोग।
7. *शनि :* नेत्र रोग और खाँसी की बीमारी। 
8. *राहु :* नेत्र रोग, बुखार, दिमागी की खराबियाँ, अचानक चोट, दुर्घटना आदि।
9. *केतु :* रीढ़, जोड़ों का दर्द, शुगर, कान, स्वप्न दोष, हार्निया, गुप्तांग संबंधी रोग आदि।  

🌻 *ग्रहो के दुष्प्रभाव से होने वाले रोगों का निवारण :* 🌻

1. *बृहस्पति* : केसर का तिलक रोजाना लगाएँ या कुछ मात्रा में केसर खाएँ।
2. *सूर्य :* बहते पानी में गुड़ बहाएँ।
3. *चंद्र :* किसी मंदिर में कुछ दिन कच्चा दूध और चावल रखें या खीर-बर्फी का दान करें।
4. *शुक्र :* गाय की सेवा करें और घर तथा शरीर को साफ-सुथरा रखें।
5. *मंगल :* बरगद के वृक्ष की जड़ में मीठा कच्चा दूध 43 दिन लगातार डालें। उस दूध से भिगी मिट्टी का तिलक लगाएँ। 
6. *बुध :* 96 घंटे के लिए नाक छिदवाकर उसमें चाँदी का तार या सफेद धागा डाल कर रखें। ताँबे के पैसे में सूराख करके बहते पानी में बहाएँ।
7. *शनि :* बहते पानी में रोजाना नारियल बहाएँ।
8. *राहु :* जौ, सरसों या मूली का दान करें।
9. *केतु :* मिट्टी के बने तंदूर में मीठी रोटी बनाकर 43 दिन कुत्तों को खिलाएँ।  
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माथे पर कुमकुम का तिलक*

*माथे पर कुमकुम का तिलक*

महिलाएं एवं पुरुष माथे पर कुमकुम या तिलक लगाते हैं।

वैज्ञानिक तर्क-

आंखों के बीच में माथे तक एक नस जाती है। कुमकुम या तिलक लगाने से उस जगह की ऊर्जा बनी रहती है। माथे पर तिलक लगाते वक्त जब अंगूठे या उंगली से प्रेशर पड़ता है, तब चेहरे की त्वचा को रक्त सप्लाई करने वाली मांसपेशी सक्रिय हो जाती है। इससे चेहरे की कोश‍िकाओं तक अच्छी तरह रक्त पहुंचता है.

Durga chalisa

दुर्गा चालीसा

नमो नमो दुर्गे सुख करनी ।
नमो नमो अम्बे दुःख हरनी ॥

निराकार है ज्योति तुम्हारी ।?
तिहूं लोक फैली उजियारी ॥

शशि ललाट मुख महा विशाला ।
नेत्र लाल भृकुटी विकराला ॥

रुप मातु को अधिक सुहावे ।
दरश करत जन अति सुख पावे ॥

तुम संसार शक्ति लय कीना ।
पालन हेतु अन्न धन दीना ॥

अन्नपूर्णा हु‌ई जग पाला ।
तुम ही आदि सुन्दरी बाला ॥

प्रलयकाल सब नाशन हारी ।
तुम गौरी शिव शंकर प्यारी ॥

शिव योगी तुम्हरे गुण गावें ।
ब्रह्मा विष्णु तुम्हें नित ध्यावें ॥

रुप सरस्वती को तुम धारा ।
दे सुबुद्घि ऋषि मुनिन उबारा ॥

धरा रूप नरसिंह को अम्बा ।
प्रगट भ‌ई फाड़कर खम्बा ॥

रक्षा कर प्रहलाद बचायो ।
हिरणाकुश को स्वर्ग पठायो ॥

लक्ष्मी रूप धरो जग माही ।
श्री नारायण अंग समाही ॥

क्षीरसिन्धु में करत विलासा ।
दयासिन्धु दीजै मन आसा ॥

हिंगलाज में तुम्हीं भवानी ।
महिमा अमित न जात बखानी ॥

मातंगी धूमावति माता ।
भुवनेश्वरि बगला सुखदाता ॥

श्री भैरव तारा जग तारिणि ।
छिन्न भाल भव दुःख निवारिणी ॥

केहरि वाहन सोह भवानी ।
लांगुर वीर चलत अगवानी ॥

कर में खप्पर खड्ग विराजे ।
जाको देख काल डर भाजे ॥

सोहे अस्त्र और तिरशूला ।
जाते उठत शत्रु हिय शूला ॥

नगर कोटि में तुम्ही विराजत ।
तिहूं लोक में डंका बाजत ॥

शुम्भ निशुम्भ दानव तुम मारे ।
रक्तबीज शंखन संहारे ॥

महिषासुर नृप अति अभिमानी ।
जेहि अघ भार मही अकुलानी ॥

रुप कराल कालिका धारा ।
सेन सहित तुम तिहि संहारा ॥

परी गाढ़ सन्तन पर जब जब ।
भ‌ई सहाय मातु तुम तब तब ॥

अमरपुरी अरु बासव लोका ।
तब महिमा सब रहें अशोका ॥

ज्वाला में है ज्योति तुम्हारी ।
तुम्हें सदा पूजें नर नारी ॥

प्रेम भक्ति से जो यश गावै ।
दुःख दारिद्र निकट नहिं आवे ॥

ध्यावे तुम्हें जो नर मन ला‌ई ।
जन्म-मरण ताको छुटि जा‌ई ॥

जोगी सुर मुनि कहत पुकारी ।
योग न हो बिन शक्ति तुम्हारी ॥

शंकर आचारज तप कीनो ।
काम अरु क्रोध जीति सब लीनो ॥

निशिदिन ध्यान धरो शंकर को ।
काहू काल नहिं सुमिरो तुमको ॥

शक्ति रूप को मरम न पायो ।
शक्ति ग‌ई तब मन पछतायो ॥

शरणागत हु‌ई कीर्ति बखानी ।
जय जय जय जगदम्ब भवानी ॥

भ‌ई प्रसन्न आदि जगदम्बा ।
द‌ई शक्ति नहिं कीन विलम्बा ॥

मोको मातु कष्ट अति घेरो ।
तुम बिन कौन हरै दुःख मेरो ॥

आशा तृष्णा निपट सतवे ।
मोह मदादिक सब विनशावै ॥

शत्रु नाश कीजै महारानी ।
सुमिरों इकचित तुम्हें भवानी ॥

करौ कृपा हे मातु दयाला ।
ऋद्घि सिद्घि दे करहु निहाला ॥

जब लगि जियौं दया फल पा‌ऊँ ।
तुम्हरो यश मैं सदा सुना‌ऊँ ॥

दुर्गा चालीसा जो नित गावै ।
सब सुख भोग परम पद पावै ॥

देवीदास शरण निज जानी ।
करहु कृपा जगदम्ब भवानी ॥

शनिदेव -- स्तुति ----- ----------------------

शनिदेव -- स्तुति -----
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          शनिदेव न्याय के देवता हैं।वे अन्य ग्रहों की अपेक्षा अधिक प्रभावशाली  हैं।यदि निम्नलिखित स्तुति की जाय तो वे शीघ्र ही प्रसन्न हो जाते हैं और अपने उपासकों की सभी कामनायें पूर्ण कर देते हैं --
सूर्यपुत्रो दीर्घदेहो
     विशालाक्षः शिवप्रियः।
मन्दचारः प्रसन्नात्मा
    पीडां दहतु मे शनिः।।

Friday, 2 December 2016

भगवान श्रीगणेश की सवारी चूहा ही क्यों ?

भगवान श्रीगणेश की सवारी चूहा ही क्यों ?

देवों में सर्वप्रथम पूज्य गणेश जी का वाहन चूहा है। चूहा जिसे संस्कृत में मूषक कहते हैं, जो कि शारीरिक आकार में छोटा होता है। गणेश जी बुद्धि के देवता है तो चूहा को तर्क-वितर्क का प्रतीक माना गया है। चूहे में इसके अलावा और भी कई गुण होते हैं, यही कारण है कि गणेशजी ने चूहे को ही अपना वाहन चुना था। गणेश पुराण के अनुसार हर युग में गणेश जी का वाहन बदलता रहता है। सतयुग में गणेश जी का वाहन सिंह है। त्रेता युग में गणेश जी का वाहन मयूर है और वर्तमान युग यानी कलियुग में उनका वाहन घोड़ा है। चूहा द्वापर युग में उनका वाहन था। चूहा कैसे बना गणेश जी का वाहन? इस बारे में हमारे धर्मग्रंथों में एक पौराणिक कहानी का उल्लेख मिलता है। कहानी कुछ इस तरह है कि एक बार महर्षि पराशर अपने आश्रम में ध्यान अवस्था में थे। तभी वहां कई चूहे आए और उनका ध्यान भंग करने लगे। उन चूहों ने आश्रम को तहस-नहस कर दिया। महर्षि पराशर का ध्यान भंग हो गया, वह यह सब कुछ देख रहे थे। वह इस समस्या के समाधान के लिए गणेश जी का स्मरण करने लगे। गणेश जी को जब महर्षि की समस्या के बारे में पता चला तो उन्होंने सभी चूहों को वहां से भगाने के लिए अपना पाश फेंका। आश्रम में एक चूहा ऐसा था जो सबसे ज्यादा उत्पात मचा रहा था। पाश ने उस चूहे को बांधकर गणेशजी के सामने उपस्थित किया। विशालकाय रूप के गणेशजी को देख वह चूहा उनकी उपासना करने लगा। गणेश जी उस चूहे से कहा, अब तुम मेरी शरण में हो तुम जो चाहे मांग सकते हो। गणेश जी की बातों को सुन चूहे में अहंकार पैदा हो गया। उसने गणेश जी से कहा, मुझे आपसे कुछ नहीं चाहिए, यदि आपको कुछ चाहिए तो आप मुझसे मांग सकते हैं। गणेश जी उसकी बात सुनकर प्रसन्न हुए और चूहे से कहा, मूषक यदि तुम कुछ देना चाहते हो तो मेरे आजीवन वाहन बन जाओ। चूहे ने स्वीकार कर लिया। जब गणेशजी, चूहे पर बैठे तो उसका शरीर, गणेशजी के वजन को सह नहीं पाया और उसका घमंड चूर-चूर हो गया। उसने अपने इस कृत्य के लिए माफी मांगी। तब गणेश जी ने अपना वजन कम किया। और इस तरह आज तक गणेश जी का वाहन वही चूहा है।

शनिवार को क्या न ले

 शनिवार को कुछ विशेष चीजों को घर लाने से बचना चाहिए। इससे न केवल भाग्य संवरता है वरन शनि की प्रतिकूल दशा और साढ़े साती के अशुभ फल में भी राहत मिलती है। जानिए ऐसी कौन सी वस्तुएं हैं तो आपको शनिवार को न तो खरीदनी चाहिए और न ही घर लानी चाहिए।

लोहा खरीदने से घर आता है दुर्भाग्य

लंबे समय से मान्यता है कि शनिवार को किसी भी रूप में लोहे को न तो खरीदना चाहिए और न ही घर लाना चाहिए। माना जाता है कि इस दिन लोहे का सामान खरीदना व्यक्ति और उसके परिवार के लिए दुर्भाग्य लाता है। परन्तु इस दिन यदि आप लोहे का दान कर सकते हैं तो यह आपके लिए सोने पर सुहागा वाला सिद्ध होता है और आपके व्यापार में तरक्की के रास्ते खोलता है।

तेल के साथ आती है बीमारी

लोहे की ही तरह तेल भी शनि की कारक वस्तु है। इस दिन तेल (विशेष रूप से सरसों तथा वनस्पति तेल) खरीदने से बचना चाहिए। इससे घर में बीमारी का वास होता है। यदि आपकी कुंडली में शनि की साढ़े साती या महादशा चल रही है तो इस दिन किसी शनि मंदिर में तेल का दान करना चाहिए।

नमक लाता है कर्ज

शनिवार को नमक खरीदने से यह उस घर पर कर्ज लाता है। साथ ही रोगकारी भी होता है। यही बेहतर होगा कि शनिवार के बजाय किसी और दिन नमक खरीदा जाएं।

झाड़ू से आती है दरिद्रता

झाड़ु घर की साफ-सफाई कर सकारात्मक ऊर्जा लाती है। परन्तु झाड़ू खरीदने के लिए शनिवार उपयुक्त वार नहीं है। इसे शनिवार तथा मंगलवार की बजाय सप्ताह के अन्य दिनों में खरीदना चाहिए।

स्याही से मिलता है अपयश

पढ़ाई-लिखाई से संबंधित सामग्री खरीदने के लिए शनिवार विशेष फलदायी होता है परन्तु स्याही खरीदने के लिए शनिवार शुभ नहीं माना जाता है। मान्यता है कि इस दिन स्याही खरीदने से व्यक्ति को चारित्रिक कलंक तथा अपयश का सामना करना पड़ता है।

ईंधन लाता है परिवार पर संकट

भारतीय संस्कृति में अग्नि को पवित्र माना जाता है तथा इसकी पवित्रता पर विशेष जोर दिया जाता है। परन्तु शनिवार को अग्नि से संबंधित कोई भी वस्तु यथा केरोसीन, माचिस आदि ज्वलनशील पदार्थ खरीदना वर्जित बताया गया है। सामाजिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन खरीदे गए ईंधन से घर तथा परिवार पर बड़ा संकट आता है।

जूतों से आती हैं असफलता

अगर आपको काले रंग के तथा चमड़े के जूते खरीदने हैं तो शनिवार को न खरीदें। मान्यता है कि शनिवार को खरीदे गए काले जूते पहनने वाले को कार्य में असफलता दिलाते हैं। हां यदि किसी अन्य रंग के जूते खरीदने हैं या कपड़े के जूते खरीदनें है तो आप खरीद सकते हैं परन्तु उनका कलर काला नहीं होना चाहिए।

काले तिल देते हैं हर काम में बाधा

काले तिलों का पूजा में विशेष स्थान है। ये शरीर को भी स्वस्थ और सुंदर बनाते हैं। इसके अतिरिक्त शनि देव की बुरी दशा से बचने के लिए ज्योतिषियों द्वारा काले तिल का दान बताया जाता है। परन्तु शनिवार को काले तिल खरीदना अच्छे भाग्य में बाधा का कार्य करता है। इसलिए भूलकर भी शनिवार को काले तिल न खरीदें।

शुभं   करोति   कल्याणं

शुभं   करोति   कल्याणं

Shubham Karoti Kalyanam

 

शुभं करोति कल्याणमारोग्यं धनसंपदा ।
शत्रुबुद्धिविनाशाय दीपज्योतिर्नमोऽस्तुते ॥
Shubham Karoti Kalyaannam-Aarogyam Dhana-Sampadaa |
Shatru-Buddhi-Vinaashaaya Diipa-Jyotir-Namostute ||

Meaning:
1: (Salutations to the Light of the Lamp) Which Brings Auspiciousness, Health and Prosperity,
2: Which Destroys Inimical Feelings; Salutations to the Light of the Lamp.

दीपज्योतिः परब्रह्म दीपज्योतिर्जनार्दनः ।
दीपो हरतु मे पापं दीपज्योतिर्नमोऽस्तुते ॥
Diipa-Jyotih Para-Brahma Diipa-Jyotir-Janaardanah |
Diipo Haratu Me Paapam Diipa-Jyotir-Namostute ||

Meaning:
1: (Salutations to the Light of the Lamp) The Light of the Lamp represents the Supreme Brahman, the Light of the Lamp represents Janardhana (Sri Vishnu),
2: Let the Light of the Lamp Remove My Sins; Salutationsto the Light of the Lamp.