Tuesday, 18 December 2018

उच्च सफलता के योग-

उच्च सफलता के योग-
1. जन्म-कुंडली में दशम स्थान
जन्म-कुंडली में दशम स्थानको (दसवां स्थान) को तथा छठे भाव को जॉब आदि के लिए जाना जाता है। सरकारी नौकरी के योग को देखने के लिए इसी घर का आकलन किया जाता है। दशम स्थान में अगर सूर्य, मंगल या ब्रहस्पति की दृष्टि पड़ रही होती है साथ ही उनका सम्बन्ध छठे भाव से हो तो सरकारी नौकरी का प्रबल योग बन जाता है। कभी-कभी यह भी देखने में आता है कि जातक की कुंडली में दशम में तो यह ग्रह होते हैं लेकिन फिर भी जातक को संघर्ष करना पड़ रहा होता है तो ऐसे में अगर सूर्य, मंगल या ब्रहस्पति पर किसी पाप ग्रह (अशुभ ग्रह) की दृष्टि पड़ रही होती है तब जातक को सरकारी नौकरी प्राप्ति में दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। अतः यह जरूरी है कि आपके यह ग्रह पाप ग्रहों से बचे हुए रहें।
2. जन्म कुंडली में जातक का लग्न
जन्म कुंडली में यदि जातक का लग्न मेष, मिथुन, सिंह, वृश्चिक, वृष या तुला है तो ऐसे में शनि ग्रह और गुरु (वृहस्पति) का एक-दूसरे से केंद्र या त्रिकोण में होना, सरकारी नौकरी के लिए अच्छा योग उत्पन्न करते हैं।
3. जन्म कुंडली में यदि केंद्र में अगर चन्द्रमा, ब्रहस्पति एक साथ होते हैं तो उस स्थिति में भी सरकारी नौकरी के लिए अच्छे योग बन जाते हैं। साथ ही साथ इसी तरह चन्द्रमा और मंगल भी अगर केन्द्रस्थ हैं तो सरकारी नौकरी की संभावनाएं बढ़ जाती हैं।
4. कुंडली में दसवें घर के बलवान होने से तथा इस घर पर एक या एक से अधिक शुभ ग्रहों का प्रभाव होने से जातक को अपने करियर क्षेत्र में बड़ी सफलताएं मिलतीं हैं तथा इस घर पर एक या एक से अधिक बुरे ग्रहों का प्रभाव होने से कुंडली धारक को आम तौर पर अपने करियर क्षेत्र में अधिक सफलता नहीं मिल पाती है।
5. ज्योतिष शास्त्र में सूर्य तथा चंद्र को राजा या प्रशासन से सम्बंध रखने वाले ग्रह के रूप में जाना जाता है। सूर्य या चंद्र का लग्न, धन, चतुर्थ तथा कर्म से सम्बंध या इनके मालिक के साथ सम्बंध सरकारी नौकरी की स्थिति दर्शाता है। सूर्य का प्रभाव चंद्र की अपेक्षा अधिक होता है।
6. लग्न पर बैठे किसी ग्रह का प्रभाव व्यक्ति के जीवन में सबसे अधिक प्रभाव रखने वाला माना जाता है। लग्न पर यदि सूर्य या चंद्र स्थित हो तो व्यक्ति शाषण से जुडता है और अत्यधिक नाम कमाने वाला होता है।
7. चंद्र का दशम भाव पर दृष्टी या दशमेश के साथ युति सरकारी क्षेत्र में सफलता दर्शाता है। यधपि चंद्र चंचल तथा अस्थिर ग्रह है जिस कारण जातक को नौकरी मिलने में थोडी परेशानी आती है। ऐसे जातक नौकरी मिलने के बाद स्थान परिवर्तन या बदलाव के दौर से बार बार गुजरते है।
8. सूर्य धन स्थान पर स्थित हो तथा दशमेश को देखे तो व्यक्ति को सरकारी क्षेत्र में नौकरी मिलने के योग बनते है। ऐसे जातक खुफिया ऐजेंसी या गुप चुप तरीके से कार्य करने वाले होते है।
9. सूर्य तथा चंद्र की स्थिति दशमांश कुंडली के लग्न या दशम स्थान पर होने से व्यक्ति राज कार्यो में व्यस्त रहता है ऐसे जातको को बडा औहदा प्राप्त होता है।
10. यदि ग्रह अत्यधिक बली हो तब भी वें अपने क्षेत्र से सम्बन्धित सरकारी नौकरी दे सकते है। मंगल सैनिक, या उच्च अधिकारी, बुध बैंक या इंश्योरेंस, गुरु- शिक्षा सम्बंधी, शुक्र फाइनेंश सम्बंधी तो शनि अनेक विभागो में जोडने वाला प्रभाव रखता है।
11. सूर्य चंद्र का चतुर्थ प्रभाव जातक को सरकारी क्षेत्र में नौकरी प्रदान करता है। इस स्थान पर बैठे ग्रह सप्तम दृष्टि से कर्म स्थान को देखते है।
12. सूर्य यदि दशम भाव में स्थित हो तो व्यक्ति को सरकारी कार्यो से अवश्य लाभ मिलता है। दशम स्थान कार्य का स्थान हैं। इस स्थान पर सूर्य का स्थित होना व्यक्ति को सरकारी क्षेत्रो में अवश्य लेकर जाता है। सूर्य दशम स्थान का कारक होता है जिस कारण इस भाव के फल मिलने के प्रबल संकेत मिलते है।
13. यदि किसी जातक की कुंडली में दशम भाव में मकर राशि में मंगल हो या मंगल अपनी राशि में बलवान होकर प्रथम, चतुर्थ, पंचम, सप्तम, नवम या दशम में स्थित हो तो सरकारी नौकरी का योग बनता है ।
14. यदि मंगल स्वराशि का हो या मित्र राशि का हो तथा दशम में स्थित हो या मंगल और दशमेश की युति हो तो सरकारी नौकरी का योग बनता है ।
15. चंद्र केंद्र या त्रिकोण में बली हो तो सरकारी नौकरी का योग बनाता है ।
16. यदि सूर्य बलवान होकर दशम में स्थित हो या सूर्य की दृष्टि दशम पर हो तो जातक सरकारी नौकरी में जाता है ।
17. यदि किसी जातक की कुंडली में लग्न में गुरु या चौथे भाव में गुरु हो या दशमेश ग्यारहवे भाव में स्थित हो तो सरकारी नौकरी का योग बनता है ।
18. यदि जातक की कुंडली में दशम भाव पर सूर्य, मंगल या गुरु की दृष्टि पड़े तो यह सरकारी नौकरी का योग बनता है ।
19. यदि १० भाव में मंगल हो, या १० भाव पर मंगल की दृष्टी हो,
20. यदि मंगल ८ वे भाव के अतिरिक्त कही पर भी उच्च राशी मकर (१०) का होतो।
21. मंगल केंद्र १, ४, ७, १०, या त्रिकोण ५, ९ में हो तो.
22. यदि लग्न से १० वे भाव में सूर्य (मेष) , या गुरू (४) उच्च राशी का हो तो। अथवा स्व राशी या मित्र राशी के हो।
23. लग्नेश (१) भाव के स्वामी की लग्न पर दृष्टी हो।
24. लग्नेश (१) +दशमेश (१०) की युति हो।
25. दशमेश (१०) केंद्र १, ४, ७, १० या त्रिकोण ५, ९ वे भाव में हो तो। उपरोक्त योग होने पर जातक को सरकारी नौकरी मिलती है। जितने ज्यादा योग होगे , उतना बड़ा पद प्राप्त होगा।
26. भाव:कुंडली के पहले, दसवें तथा ग्यारहवें भाव और उनके स्वामी से सरकारी नौकरी के बारे मैं जान सकते हैं।
27.सूर्य. चंद्रमा व बृहस्पति सरकारी नौकरी मै उच्च पदाधिकारी बनाता है।
28. भाव :द्वितीय, षष्ठ एवं दशम्‌ भाव को अर्थ-त्रिकोण सूर्य की प्रधानता होने पर सरकारी नौकरी प्राप्त करता है।
29. नौकरी के कारक ग्रहों का संबंध सूर्य व चन्द्र से हो तो जातक सरकारी नौकरी पाता है।
30. दसवें भावमें शुभ ग्रह होना चाहिए।
31. दसवें भाव में सूर्य तथा मंगल एक साथ होना चाहिए।
32. पहले, नवें तथा दसवें घर में शुभ ग्रहों को होना चाहिए।
33. पंच महापुरूष योग: जीवन में सफलता एवं उसके कार्य क्षेत्र के निर्धारण में महत्वपूर्ण समझे जाते हैं।पंचमहापुरूष योग कुंडली में मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र एवं शनि अपनी स्वराशि अथवा उच्च राशि का होकर केंद्र में स्थित होने पर महापुरुष योग बनता
34. पाराशरी सिद्धांत के अनुसार, दसवें भाव के स्वामी की नवें भाव के स्वामी के साथ दृष्टि अथवा क्षेत्र और राशि स्थानांतर संबंध उसके लिए विशिष्ट राजयोग का निर्माण करते हैं।
कुंडली से जाने नौकरी प्राप्ति का समय नियम:
1. लग्न के स्वामी की दशा और अंतर्दशा में
2. नवमेश की दशा या अंतर्दशा में
3. षष्ठेश की दशा या, अंतर्दशा में
4. प्रथम,दूसरा , षष्ठम, नवम और दशम भावों में स्थित ग्रहों की दशा या अंतर्दशा में
5. दशमेश की दशा या अंतर्दशा में
6. द्वितीयेश और एकादशेश की दशा या अंतर्दशा में
7. नौकरी मिलने के समय जिस ग्रह की दशा और अंतर्दशा चल रही है उसका संबंध किसी तरह दशम भाव या दशमेश से ।
8. द्वितीयेश और एकादशेश की दशा या अंतर्दशा में भी नौकरी मिल सकती है।
9. छठा भाव :छठा भाव नौकरी का एवं सेवा का है। छठे भाव का कारक भाव शनि है।
10. दशम भाव या दशमेश का संबंध छठे भाव से हो तो जातक नौकरी करता है।
11. राहु और केतु की दशा, या अंतर्दशा में :
जीवन की कोई भी शुभ या अशुभ घटना राहु और केतु की दशा या अंतर्दशा में हो सकती है।
12. गोचर: गुरु गोचर में दशम या दशमेश से केंद्र या त्रिकोण में ।
13. गोचर : नौकरी मिलने के समय शनि और गुरु एक-दूसरे से केंद्र, या त्रिकोण में हों तो नौकरी मिल सकती है
14. गोचर : नौकरी मिलने के समय शनि या गुरु का या दोनों का दशम भाव और दशमेश दोनों से या किसी एक से संबंध होता है।
15. कुंडली का पहला, दूसरा, चौथा, सातवा, नौवा, दसवा, ग्यारहवा घर तथा इन घरों के स्वामी अपनी दशा और अंतर्दशा में जातक को कामयाबी प्रदान करते है।

Saturday, 15 December 2018

चौपाई

1) मनोकामना पूर्ति एवं सर्वबाधा निवारण हेतु- 


 

'कवन सो काज कठिन जग माही।

जो नहीं होइ तात तुम पाहीं।।'


 

(2) भय व संशय निवृ‍‍त्ति के लिए-

 

'रामकथा सुन्दर कर तारी।

संशय बिहग उड़व निहारी।।' 


 

(3) अनजान स्थान पर भय के लिए मंत्र पढ़कर रक्षारेखा खींचे-

 


'मामभिरक्षय रघुकुल नायक।

धृतवर चाप रुचिर कर सायक।।'

 

 (4) भगवान राम की शरण प्राप्ति हेतु-

 


'सुनि प्रभु वचन हरष हनुमाना।

सरनागत बच्छल भगवाना।।'

 

(5) विपत्ति नाश के लिए- 

 


'राजीव नयन धरें धनु सायक।

भगत बिपति भंजन सुखदायक।।' 

 

(6) रोग तथा उपद्रवों की शांति हेतु-

 


'दैहिक दैविक भौतिक तापा।

राम राज नहिं काहुहिं ब्यापा।।'

 

 (7) आजीविका प्राप्ति या वृद्धि हेतु-


 

'बिस्व भरन पोषन कर जोई।

ताकर नाम भरत अस होई।।' 

 


(8) विद्या प्राप्ति के लिए-

 

'गुरु गृह गए पढ़न रघुराई।

अल्पकाल विद्या सब आई।।'

 


(9) संपत्ति प्राप्ति के लिए-

 

'जे सकाम नर सुनहिं जे गावहिं।

सुख संपत्ति नानाविधि पावहिं।।'

 


(10) शत्रु नाश के लिए-

 

'बयरू न कर काहू सन कोई।

रामप्रताप विषमता खोई।।'

 


आवश्यकता के अनुरूप कोई मंत्र लेकर एक माला जपें तथा एक माला का हवन करें। जप के पहले श्री हनुमान चालीसा का पाठ कर लें तो शुभ रहेगा। जब तक कार्य पूरा न हो, तब तक एक माला (तुलसी की) नित्य जपें। यदि सम्पुट में इनका प्रयोग करें तो शीघ्र तथा निश्चित कार्यसिद्धि होगी। नवरात्रि में एक दिन सुंदरकांड अवश्य करें। 

चौपाइयों को सिद्ध करने की विधि - 

चौपाइयों को सिद्ध करने की विधि - 


रामनवमी पर इन चौपाईयों को सिद्ध करने के लिए एक छोटा सा हवन करें। यह हवन रात 10 बजे के बाद ही शुरु करें। इस हवन को करने के लिए अनिवार्य सामग्रियां जान लें और उनकी मात्रा का विशेष ध्यान रखें - 


 


हवन सामग्री- 1. चंदन का बुरादा 2. तिल 3. शुद्ध घी 4. चीनी 5. अगर 6. तगर 7. कपूर 8. शुद्ध केसर 9. नागरमोथा 10. पंचमेवा और 11. जौ। इन सभी सामग्रियों को मिलाकर 108 आहुति के लिए कुल 1 सेर यानि 80 तोला सामग्री बनाएं।


अब चौपाई को पढ़ते हुए कुल 108 आहुतियां, जिसमें प्रत्येक चौपाई पढ़ते समय 1 आहुति डालें और हवन करें। प्रत्येक आहुति डालते समय चौपाई के अंत में स्वाहा अवश्य बोलें।
 
एक दिन हवन करने से ही मंत्र सिद्ध हो जाता है। इसके बाद जब तक कार्य सफल न हो, तब तक उस चौपाई रूपी मंत्र का प्रतिदिन कम-से-कम 108 बार सुबह या रात्रि को सुविधानुसार जप करें।
 
यदि दो-तीन कार्यों के लिये दो-तीन चौपाइयों का अनुष्ठान करना चाहें, तो पहले उन्हें अलग-अलग हवन करके सिद्ध कर लें।लंकाकांड की चौपाई होने पर शनिवार को हवन करें। 

 


Thursday, 13 December 2018

संतान प्राप्ति के अचूक उपाय

संतान प्राप्ति के अचूक उपाय

ध्यान रहे कि जिनकी जिंदगी में ऐसा दुःख नहीं होता वो इस बात के मर्म को नहीं समझ सकते हैं किंतु जो वाकई इससे पीड़ित हैं, उन्हें इसका चमत्कार बहुत शीघ्र देखने को मिलता है। परंतु इससे पूर्व संतान हीनता से पीड़ित हर जातक को ये तथ्य भली-भांति समझ लेनी होगी कि किसी भी मंत्र-तंत्र-यंत्र सहित रत्न तक आस्था-श्रद्धा-विश्वास व अटूट निष्ठा की मांग करते हैं। यानि इन प्रयोगों को अपनाने के लिए आपको इतना संकल्पकृत होना ही होगा कि मध्य राह में चाहे जितनी बाधाएं आएं किंतु आप अपने कदम डिगने नहीं देंगे।

इसी तथ्य को ध्यान में रखते हुए हमने गत आलेख में ये स्पष्ट किया था कि डेस्टिनी चेंज हो सकती है बशर्ते आप ग्रहों की चालाकियां समझ लें तथा अपने विवेक को इस्तेमाल करते हुए सही ढंग से उपाय करें।

तो आइए अब हम संतानहीन योगों के बावज़ूद संतान प्राप्ति के उपायों की बात आरंभ करते हैं:

यदि पति व पत्नी, दोनों की कुण्डलियों में पूर्ण संतानहीनता की स्थिति हो तो उन्हें संतान बाधा मुक्ति के लिए निम्न उपाय अविलंब आरंभ करना चाहिए। इसका परिणाम हमेशा सुखद रहा है............
मंत्र: ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं ग्लौं देवकीसुत गोविन्द वासुदेव जगत्पते देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गतः

जप विधि: तुलसी की माला से प्रतिदिन 5 माला प्रातः काल जप करना श्रेयस्कर रहेगा।

भगवान श्रीकृष्ण की तस्वीर के सामने बैठकर कातर भाव से जप करने के पश्चात लड्डू का भोग (प्रसाद) अवश्य चढ़ाएं।

पुत्रेष्टि यज्ञ: यह एक विशद यज्ञ विधान है, जिसे आचार्यों की सहायता के बिना करना संभव नहीं। इस महान यज्ञ का अनुष्ठान संतानहीनता की स्थिति से मुक्त कर देता है। वस्तुतः यह याज्ञिक विधान वैदिक रीति से संपन्न किया जाता है जिसमें भारी व्यय होता है। इसलिए आम आदमी को ये सलाह दी जाती है कि वह इस यज्ञ के स्थान पर गोपाल संतान मंत्र व यंत्र की सहायता ले ताकि बिना किसी व्यय के उसका कार्य पूर्ण हो जाए।

बाधक ग्रहों की क्रूर व पापी ग्रहों की किरण रश्मियों को पंचम भाव, पंचमेश तथा संतान कारक गुरु से हटाने के लिए रत्नों का विकल्प बेहद प्रभावी रहता है। इस बात को समझने के लिए विशेषज्ञ आचार्य की अनिवार्यता होती है ताकि वह निर्धारित कर सके कि किन ग्रहों के कारण संतान प्राप्ति में बाधा आ रही है तथा किन ग्रहों की किरण रश्मियों को प्रतिकर्षित करने के लिए कैसे रत्नों का प्रयोग किया जाए।

संतानहीनता के लिए नवमांश की स्थिति की समीक्षा किया जाना बेहद आवश्यक है। यदि नवमांश चक्र में भी पूर्णरूपेण संतानहीनता की स्थिति बन रही है तो ऐसे में उपरोक्त वर्णित प्रथम उपाय के साथ तृतीय उपाय एक साथ करना लाभकारी होता है।

ध्यान रहे कि इन सभी प्रयोगों का फल पूर्ण निष्ठा से करने पर ही प्राप्त होता है। जिनके मन में इन उपायों को करते रहने के दौरान संशय व्याप्त रहता है, उन्हें इसका फल अपेक्षानुसार नहीं प्राप्त हो पाता है।




गाय की सेवा से होते है लाभ

गाय की सेवा से होते है लाभ

प्राचीन समय में हर रोज घर में गौमूत्र का छिडक़ाव किया जाता था। आज भी इस परंपरा का पालन कई लोग करते हैं। घर में सुख और समृद्धि बनी रहे इसके लिए पुराने समय से कई परंपराएं प्रचलित हैं। इन परंपराओं का पालन जिन घरों में किया जाता है, वहां का वातावरण सकारात्मक और पवित्र बना रहता है। ऐसा करने पर घर का वातावरण शुभ और पवित्र बना रहता है। गौमूत्र छिडक़ने से होनेे वाले लाभ...
गौमूत्र से दूर होते हैं कई दोष
यदि हम नियमित रूप से गौमूत्र का छिडक़ाव करते हैं तो घर के वास्तु दोष कम हो सकते हैं। वास्तु दोष के कारण आ रही परेशानियां कम हो सकती हैं। यदि घर के आसपास कोई नकारात्मक ऊर्जा सक्रिय होगी तो वह भी निष्क्रिय हो सकती है।
 
गौमूत्र के सेवन से दूर होते हैं कई रोग
आयुर्वेद के अनुसार गौमूत्र का नियमित सेवन कई बीमारियों को खत्म कर सकता है। बहुत सी बीमारियों में दवा के रूप में इसका उपयोग किया जाता है। जो लोग नियमित रूप से थोड़े से गौमूत्र का भी सेवन करते हैं, उनकी रोगप्रतिरोधी क्षमता बढ़ती है। मौसम परिवर्तन के समय होने वाली कई बीमारियां दूर ही रहती हैं। शरीर स्वस्थ और ऊर्जावान बना रहता है।
 
घर में गौमूत्र छिडक़ने से मिलती है लक्ष्मी कृपा
जिस घर में प्रतिदिन गौमूत्र का छिडक़ा जाता है, वहां देवी लक्ष्मी की विशेष कृपा बरसती है। जिससे घर में धन-धान्य की कमी नहीं आती है।
गाय की सेवा से प्रसन्न होते हैं देवी-देवता
गाय को पवित्र और पूजनीय माना गया है। ऐसी मान्यता है कि गाय के शरीर में सभी देवी-देवताओं का वास होता है। इस कारण कभी भी गाय का अनादर नहीं करना चाहिए। जो लोग गाय की सेवा करते हैं, उन्हें सभी देवी-देवताओं की कृपा प्राप्त होती है और पुण्य की बढ़ोतरी होती है। पुराने समय में तो अधिकांश लोग अपने-अपने घर में ही गाय को पालते थे, लेकिन आज काफी कम लोगों के घर में गाय होती है। जिन लोगों के यहां गाय नहीं है, वे नियमित रूप से किसी गौशाला में हरी घास का दान कर सकते हैं या अपनी इच्छा के अनुसार धन का दान कर सकते हैं। इस सेवा से भी गौमाता की कृपा प्राप्त होती है। गौसेवा का महत्व इस बात से भी प्रकट होता है कि स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने भी गौमाता की सेवा की है।
 
गौमूत्र की गंध से नष्ट होते हैं हानिकारक सूक्ष्म कीटाणु
घर के वातावरण में मौजूद कई प्रकार के हानिकारक सूक्ष्म कीटाणु गौमूत्र के प्रभाव से नष्ट हो जाते हैं। इससे परिवार के सदस्यों को स्वास्थ्य संबंधी लाभ प्राप्त होता है।




Wednesday, 12 December 2018

विवाह योग के मुख्य कारक :-

विवाह योग के मुख्य कारक :-

विवाह योग के लिये जो कारक मुख्य है वे इस प्रकार हैं —
सप्तम भाव का स्वामी खराब है या सही है वह अपने भाव में बैठ कर या किसी अन्य स्थान पर बैठ कर अपने भाव को देख रहा है।
सप्तम भाव पर किसी अन्य पाप ग्रह की द्रिष्टि नही है।
कोई पाप ग्रह सप्तम में बैठा नही है।
यदि सप्तम भाव में सम राशि है।
सप्तमेश और शुक्र सम राशि में है।
सप्तमेश बली है।
सप्तम में कोई ग्रह नही है।
किसी पाप ग्रह की द्रिष्टि सप्तम भाव और सप्तमेश पर नही है।
दूसरे सातवें बारहवें भाव के स्वामी केन्द्र या त्रिकोण में हैं,और गुरु से द्रिष्ट है।
सप्तमेश की स्थिति के आगे के भाव में या सातवें भाव में कोई क्रूर ग्रह नही है।

विवाह प्रतिवंधक योग —
सप्तमेश शुभ स्थान पर नही है।
सप्तमेश छ: आठ या बारहवें स्थान पर अस्त होकर बैठा है।
सप्तमेश नीच राशि में है।
सप्तमेश बारहवें भाव में है,और लगनेश या राशिपति सप्तम में बैठा है।
चन्द्र शुक्र साथ हों,उनसे सप्तम में मंगल और शनि विराजमान हों।
शुक्र और मंगल दोनों सप्तम में हों।
शुक्र मंगल दोनो पंचम या नवें भाव में हों।
शुक्र किसी पाप ग्रह के साथ हो और पंचम या नवें भाव में हो।
शुक्र बुध शनि तीनो ही नीच हों।
पंचम में चन्द्र हो,सातवें या बारहवें भाव में दो या दो से अधिक पापग्रह हों।
सूर्य स्पष्ट और सप्तम स्पष्ट बराबर का हो।

विवाह में बिलम्ब का कारण —
सप्तम में बुध और शुक्र दोनो के होने पर विवाह वादे चलते रहते है,विवाह आधी उम्र में होता है।
चौथा या लगन भाव मंगल (बाल्यावस्था) से युक्त हो,सप्तम में शनि हो तो कन्या की रुचि शादी में नही होती है।
सप्तम में शनि और गुरु शादी देर से करवाते हैं।
चन्द्रमा से सप्तम में गुरु शादी देर से करवाता है,यही बात चन्द्रमा की राशि कर्क से भी माना जाता है।
सप्तम में त्रिक भाव का स्वामी हो,कोई शुभ ग्रह योगकारक नही हो,तो पुरुष विवाह में देरी होती है।
सूर्य मंगल बुध लगन या राशिपति को देखता हो,और गुरु बारहवें भाव में बैठा हो तो आध्यात्मिकता अधिक होने से विवाह में देरी होती है।
लगन में सप्तम में और बारहवें भाव में गुरु या शुभ ग्रह योग कारक नही हों,परिवार भाव में चन्द्रमा कमजोर हो तो विवाह नही होता है,अगर हो भी जावे तो संतान नही होती है।
महिला की कुन्डली में सप्तमेश या सप्तम शनि से पीडित हो तो विवाह देर से होता है।
राहु की दशा में शादी हो,या राहु सप्तम को पीडित कर रहा हो,तो शादी होकर टूट जाती है,यह सब दिमागी भ्रम के कारण होता है।

विवाह का समय –
सप्तम या सप्तम से सम्बन्ध रखने वाले ग्रह की महादशा या अन्तर्दशा में विवाह होता है।
कन्या की कुन्डली में शुक्र से सप्तम और पुरुष की कुन्डली में गुरु से सप्तम की दशा में या अन्तर्दशा में विवाह होता है।
सप्तमेश की महादशा में पुरुष के प्रति शुक्र या चन्द्र की अन्तर्दशा में और स्त्री के प्रति गुरु या मंगल की अन्तर्दशा में विवाह होता है।
सप्तमेश जिस राशि में हो,उस राशि के स्वामी के त्रिकोण में गुरु के आने पर विवाह होता है।
गुरु गोचर से सप्तम में या लगन में या चन्द्र राशि में या चन्द्र राशि के सप्तम में आये तो विवाह होता है।
गुरु का गोचर जब सप्तमेश और लगनेश की स्पष्ट राशि के जोड में आये तो विवाह होता है।
सप्तमेश जब गोचर से शुक्र की राशि में आये और गुरु से सम्बन्ध बना ले तो विवाह या शारीरिक सम्बन्ध बनता है।
सप्तमेश और गुरु का त्रिकोणात्मक सम्पर्क गोचर से शादी करवा देता है,या प्यार प्रेम चालू हो जाता है।
चन्द्रमा मन का कारक है,और वह जब बलवान होकर सप्तम भाव या सप्तमेश से सम्बन्ध रखता हो तो चौबीसवें साल तक विवाह करवा ही देता है।

सप्तम भावस्थ शनि: विवाह के लिए शुभद नहीं माना जाता :-
सप्तम भाव लन्म कुण्डली में सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। लग्न से सातवाँ भाव ही दाम्पत्य व विवाह-कारक माना गया है। इस भाव एवं इस भाव के स्वामी के साथ ग्रहों की स्थिति व दृष्टि संबंध के अनुसार उस जातक पर शुभ-अशुभ प्रभाव पड़ता है। सप्तम भाव विवाह एवं जीवनसाथी का घर माना जाता है। इस भाव में शनि का होना विवाह और वैवाहिक जीवन के लिए शुभ संकेत नहीं माना जाता है। इस भाव में शनि स्थित होने पर व्यक्ति की शादी सामान्य आयु से देरी से होती है। सप्तम भाव में शनि अगर नीच राशि मे हो तो तब यह संभावना रहती है कि व्यक्ति काम पीड़‍ित होकर किसी ऐसे व्यक्ति से विवाह करता है जो उम्र में उससे अधिक बड़ा होता है। शनि के साथ सूर्य की युति अगर सप्तम भाव में हो तो विवाह देर से होता है एवं कलह से घर अशांत रहता है। शनि जिस कन्या की कुण्डली में सूर्य या चन्द्रमा से युत या दृष्ट होकर लग्न या सप्तम में होते हैं उनकी शादी में भी बाधा रहती है। शनि जिनकी कुण्डली में छठे भाव में होता है एवं सूर्य अष्ठम में और सप्तमेश कमजोर अथवा पाप पीड़‍ित होता है,उनके विवाह में भी काफी बाधाएँ आती हैं। शनि और राहु की युति जब सप्तम भाव में होती है तब विवाह सामान्य से अधिक आयु में होता है, यह एक ग्रहण योग भी है। इस प्रकार की स्थिति तब भी होती है जब शनि और राहु की युति लग्न में होती है और वह सप्तम भाव पर दृष्टि डालते हैं। जन्मपत्रिका में शनि-राहु की युति होने पर या सप्तमेश शुक्र अगर कमजोर हो तो विवाह अति विलम्ब से होता है। जिन कन्याओं के विवाह में शनि के कारण देरी हो उन्हें हरितालिका व्रत करना चाहिए या जन्म कुण्डली के अनुसार उपाय करना लाभदायक रहता है। चन्द्रमा के साथ शनि की युति होने पर व्यक्ति अपने जीवनसाथी के प्रति प्रेम नहीं रखता एवं किसी अन्य के प्रेम में गृह कलह को जन्म देता है। सप्तम शनि एवं उससे युति बनाने वाले ग्रह विवाह एवं गृहस्थी के लिए सुखकारक नहीं होते हैं। नवमांश कुण्डली या जन्म कुण्डली में जब शनि और चन्द्र की युति हो तो शादी 30 वर्ष की आयु के बाद ही करनी चाहिए क्योंकि इससे पहले शादी की संभावना नहीं बनती है। जिनकी कुण्डली में चन्द्रमा सप्तम भाव में होता है और शनि लग्न में,उनके साथ भी यही स्थिति होती है। इनकी शादी असफल होने की प्रबल संभावना रहती है। जिनकी कुण्डली में लग्न स्थान से शनि द्वादश होता है और सूर्य द्वितीयेश होता है या लग्न कमजोर होने पर शादी बहुत विलम्ब से होती है। ऐसी स्थिति बनती है कि वह शादी नहीं करते।

मांगलिक दोष :-
शास्त्रानुसार कुज या मंगल दोष दाम्पत्य जीवन के लिए विशेष रुप से अनिष्टकारी माना गया है. अगर कन्या की जन्म-कुण्डली में मंगल ग्रह लग्न, चन्द्र अथवा शुक्र से 1, 2, 12, 4, 7 आठवें भाव में विराजमान हो, तो वर की आयु को खतरा होता है. वर की जन्म-कुण्डली में यही स्थिति होने पर कन्या की आयु को खतरा होता है. मंगल की यह स्थिति पति-पत्नी के बीच वाद-विवाद और कलह का कारण भी बनती है. जन्म-कुण्डली में वृहस्पति एवं मंगल की युति अथवा मंगल एवं चन्द्र की युति से मंगल दोष समाप्त हो जाता है. इसके अतिरिक्त कुछ विशेष भावों में भी मंगल की स्थिति के कुज दोष का कुफल लगभग समाप्त हो जाता है. यह अत्यन्त आवश्यक है कि कुजदोषी वर का विवाह कुजदोषी कन्या से ही किया जाए, इससे दोनों के कुजदोष समाप्त हो जाते हैं और उनका दाम्पत्य जीवन सुखी रहता है.

कन्या के विवाह में ध्यान देने योग्य बातें :-
कन्या ग्रहण के विषय में मनु ने कहा है कि वह कन्या अधिक अंग वाली, वाचाल, पिंगल, वर्णवाली रोगिणी नहीं होनी चाहिए। विवाह में सपिण्ड, विचार, गोत्र, प्रवर विचार करना चाहिए। विवाह में स्त्रियों के लिए गुरुबल तथा पुरुषों के लिए रविबल देख लेना चाहिए। कन्या एवं वर को चन्द्रबल श्रेष्ठ अर्थात् चौथा, आठवां, बारहवां, चन्द्रमा नहीं लेना चाहिए। गुरु तथा रवि भी चौथे, आठवें एवं बारहवें नहीं लेने चाहिए। विवाह में मास ग्रहण के लिए व्यास ने कहा है कि माघ, फाल्गुन, वैशाख, मार्गशीर्ष, ज्येष्ठ, अषाढ़ महिनों में विवाह करने से कन्या सौभाग्यवती होती है। रोहिणी, तीनों उत्तरा, रेवती, मूल, स्वाति, मृगशिरा, मघा, अनुराधा, हस्त ये नक्षत्र विवाह में शुभ हैं। विवाह में सौरमास ग्रहण करना चाहिए। ज्योतिषशास्त्र में कहा है–
सौरो मासो विवाहादौ यज्ञादौ सावनः स्मतः।
आब्दिके पितृकार्ये च चान्द्रो मासः प्रशस्यते।।
बृहस्पति, शुक्र, बुद्ध और सोम इन वारों में विवाह करने से कन्या सौभाग्यवती होती है। विवाह में चतुर्दशी, नवमी इन तिथियों को त्याग देना चाहिए।
इस प्रकार आपको भी धार्मिक रीति से ही विवाह संस्कार को पूर्ण करना चाहिये।

प्रेम विवाह के ज्योतिषीय सिद्धांत
ज्योतिष में वर्णित प्रेम विवाह के ज्योतिषीय सिद्धांत के द्वारा हम यह जानने में समर्थ होते है कि किसी प्रेमी- प्रेमिका का प्यार विवाह में परिणत होगा या नहीं। वस्तुतः  “प्रेमी और प्रेमिका” के मध्य प्रेम की पराकाष्ठा का विवाह में तब्दील होना ही प्रेम विवाह(Love Marriage) है  या यूं कहे कि जब लड़का और लड़की में परस्पर प्रेम होता है तदनन्तर जब दोनों एक दूसरे को जीवन साथी के रूप में देखने लगते है और वही प्रेम जब विवाह के रूप में परिणत हो जाता है तो हम उसे प्रेम-विवाह कहते है। विद्वत और प्रेमी समाज ने प्रेम को अपने अपने नजरिये से देखा है। इसलिए प्रेम सभी रूपों में प्रतिष्ठित है यथा  माता और पुत्र का स्नेह, गुरु-शिष्य का प्रेम, देवी देवताओ के प्रति प्रेम, लौकिक व अलौकिक प्रेम, विवाह पूर्व लड़का-लड़की का प्रेम इत्यादि। परन्तु प्रश्न उत्पन्न होता है की क्या सभी प्रेमी अपने प्रेमिका या प्रेमी को पाने में सफल हो सकते है ? इसका उत्तर हाँ और न दोनों में होता है, कोई प्रेमी प्रेमिका को पाने में सफल होता है, तो कोई असफल। अब पुनः प्रश्न उत्पन्न होता है की ऐसा क्यों ? ज्योतिष आचार्य इस के लिए जातक के जन्म कुंडली(Horoscope) में विराजमान ग्रहों की उच्च, नीच शत्रु क्षेत्री या मित्र ग्रह के घर में होने को ही जिम्मेदार मानते है।

प्रेम विवाह हेतु निर्धारित भाव एवं ग्रह
ज्योतिषशास्त्र में सभी विषयों के लिए निश्चित भाव निर्धारित किया गया है लग्न, पंचम, सप्तम, नवम,  एकादश, तथा द्वादश भाव को प्रेम-विवाह का कारक भाव माना गया है यथा —

लग्न भाव      —   जातक स्वयं।
पंचम भाव     —   प्रेम या प्यार का स्थान।
सप्तम भाव     —   विवाह का भाव।
नवम भाव     —   भाग्य स्थान।
एकादश भाव —    लाभ स्थान।
द्वादश भाव    —   शय्या सुख का स्थान।
वहीं सभी ग्रहो को भी विशेष कारकत्व प्रदान किया गया है। यथा “शुक्र ग्रह” को प्रेम तथा विवाह का कारक माना गया है। स्त्री की कुंडली में “ मंगल ग्रह “ प्रेम का कारक माना गया है।

प्रेम विवाह के ज्योतिषीय सिद्धांत या नियम

पंचम और सप्तम भाव तथा भावेश के साथ सम्बन्ध। पंचम भाव प्रेम का भाव है और सप्तम भाव विवाह का अतः जब पंचम भाव का सम्बन्ध सप्तम भाव भावेश से होता है तब प्रेमी-प्रेमिका वैवाहिक सूत्र में बंधते हैं।
पंचमेश-सप्तमेश-नवमेश तथा लग्नेश का किसी भी प्रकार से परस्पर सम्बन्ध हो रहा हो तो जातक का प्रेम, विवाह में अवश्य ही परिणत होगा हाँ यदि अशुभ ग्रहो का भी सम्बन्ध बन रहा हो तो वैवाहिक समस्या आएगी।
लग्नेश-पंचमेश-सप्तमेश-नवमेश तथा द्वादशेश का सम्बन्ध भी अवश्य ही प्रेमी प्रेमिका को वैवाहिक बंधन बाँधने में सफल होता है।
प्रेम और विवाह के कारक ग्रह शुक्र या मंगल का पंचम तथा सप्तम भाव-भावेश के साथ सम्बन्ध होना भी विवाह कराने में सक्षम होता है।
सभी भावो में नवम भाव की महत्वपूर्ण भूमिका होती है नवम भाव का परोक्ष या अपरोक्ष रूप से सम्बन्ध होने पर माता-पिता का आशीर्वाद मिलता है और यही कारण है की नवम भाव -भावेश का पंचम- सप्तम भाव भावेश से सम्बन्ध बनता है तो विवाह भागकर या गुप्त रूप से न होकर सामाजिक और पारिवारिक रीति-रिवाजो से होती है।
शुक्र अगर लग्न स्थान में स्थित है और चन्द्र कुण्डली में शुक्र पंचम भाव में स्थित है तब भी प्रेम विवाह संभव होता है।
नवमांश कुण्डली जन्म कुण्डली का सूक्ष्म शरीर माना जाता है अगर कुण्डली में प्रेम विवाह योग नहीं है या आंशिक है और नवमांश कुण्डली में पंचमेश, सप्तमेश और नवमेश की युति होती है तो प्रेम विवाह की संभावना प्रबल हो जाती है।
पाप ग्रहो का सप्तम भाव-भावेश से युति हो तो प्रेम विवाह की सम्भावना बन जाती है।
राहु और केतु का सम्बन्ध लग्न या सप्तम भाव-भावेश से हो तो प्रेम विवाह का सम्बन्ध बनता है।
लग्नेश तथा सप्तमेश का परिवर्तन योग या केवल सप्तमेश का लग्न में होना या लग्नेश का सप्तम में होना भी प्रेम विवाह करा देता है।
चन्द्रमा तथा शुक्र का लग्न या सप्तम में होना भी प्रेम विवाह की ओर संकेत करता है।