Sunday, 6 November 2016

प्रतिदिन सोने से पूर्व पढें दो लाइनों की श्री कृष्ण की यह अतिसरल प्रार्थना – मिलेगी सभी क्लेशों से मुक्ति


प्रतिदिन सोने से पूर्व पढें दो लाइनों की श्री कृष्ण की यह अतिसरल प्रार्थना – मिलेगी सभी क्लेशों से मुक्ति

भगवान श्री कृष्ण भक्त वत्सल हैं श्रद्धा भाव से की गयी सभी प्रार्थनाएं वे अवश्य  स्वीकार करते हैं और अपने भक्तों के सभी कष्टों का नाश करते हैं। आप भी प्रतिदिन सोने से पूर्व भगवान श्री कृष्ण की यह अतिसरल और अतिफलदाई प्रार्थना पढ़के सभी कष्टों से छुटकारा पा सकते हैं।  प्रार्थना इस प्रकार है :-

कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने l

प्रणत क्लेश नाशाय गोविन्दाय नमो नमः ll

अर्थ :- “हे श्री कृष्ण, हे वासुदेव (वसुदेवके पुत्र ) हे हरि, हे परमात्मन, हे गोविंद, आपको नमन है , मेरे सारो क्लेश का नाश करें, हम आपके शरणागत हैं। “

कमल गट्टे से उपाय


कमल गट्टे से उपाय
1- यदि रोज 108 कमल के बीजों से आहुति दें और ऐसा 21 दिन तक करें तो आने वाली कई पीढिय़ां सम्पन्न बनी रहती हैं।
2- यदि दुकान में कमल गट्टे की माला बिछाकर उसके ऊपर भगवती लक्ष्मी का चित्र स्थापित किया जाए तो व्यापार में कमी आ ही नहीं सकती। कमल गट्टे से उपायव्यापार निरंतर उन्नति की ओर अग्रसर होता रहता है।
3- कमल गट्टे की माला भगवती लक्ष्मी के चित्र पर पहना कर किसी नदी या तालाब में विसर्जित करें तो घर में निरंतर लक्ष्मी का आगमन बना रहता है।
4- जो व्यक्ति प्रत्येक बुधवार को 108 कमलगटटे के बीज लेकर घी के साथ एक-एक करके अग्नि में 108 आहुतियां देता है। उसके घर से दरिद्रता हमेशा के लिए चली जाती है।
5- जो व्यक्ति कमल गट्टे की माला अपने गले में धारण करता है। उस पर लक्ष्मी की कृपा सदा बनी रहती है।

लघु नारियल

लघु नारियल
लघु नारियल के कुछ उपाय
1- 11 लघु नारियल को मां लक्ष्मी के चरणों में रखकर
"ऊँ महालक्ष्म्यै च विद्महे विष्णुपत्नीं च धीमहि तन्नो लक्ष्मी प्रचोदयात्"
मंत्र का जप करें। 2 माला जप करने के बाद एक लाल कपड़े में उन लघु नारियलों को लपेट कर तिजोरी में रख दें व दीपावली के दूसरे दिन किसी नदी या तालाब में विसर्जित कर दें। ऐसा करने से लक्ष्मी चिरकाल तक घर में निवास करती है।
2- धन, वैभव व समृद्धि पाने के लिए 5 लघु नारियल स्थापित कर, उस पर केसर से तिलक करें और हर नारियल पर तिलक करते समय 27 बार नीचे लिखे मंत्र का मन ही मन जप करते रहें-
मंत्र- ऐं ह्लीं श्रीं क्लीं
3- अगर आप चाहते हैं कि आपके घर में कभी धन-धान्य की कमी न रहे और अन्न का भंडार भरा रहे तो
11 लघु नारियल एक पीले कपड़े में बांधकर रसोई घर के पूर्वी कोने में बांध दें।

मुख्यद्वार पर शुभ-लाभ क्यों लिखते हैं?


मुख्यद्वार पर शुभ-लाभ क्यों लिखते हैं?
किसी भी पूजन कार्य का शुभारंभ बिना स्वस्तिक के नहीं किया जा सकता। हमारे यहां मुख्यद्वार पर स्वस्तिक के आसपास शुभ-लाभ लिखने की परंपरा है क्योंकि शास्त्रों के अनुसार श्री गणेश प्रथम पूजनीय हैं और शुभ व लाभ यानी शुभ व क्षेम को उनके पुत्र माना गया है। कहते हैं जहां शुभ होता है वहां हर काम में फायदा यानी लाभ अपने आप होने लगता है या जहां हर कार्य में लाभ होता है वहां सबकुछ अपने आप शुभ होने लगता है।
इसीलिए वास्तुशास्त्र के अनुसार ऐसी मान्यता है कि घर के मुख्य द्वार पर स्वस्तिक बनाकर शुभ-लाभ लिखने से घर में हमेशा सुख-समृद्धि बनी रहती है। ऐसे घर में हमेशा गणेशजी कृपा रहती है और धन-धान्य की कमी नहीं होती।
साथ ही स्वस्तिक के साथ ही शुभ-लाभ का चिन्ह भी धनात्मक ऊर्जा का प्रतीक है, इसे बनाने से हमारे आसपास से नकारात्मक ऊर्जा दूर हो जाती है। इसलिए स्वस्तिक के चिन्ह के साथ ही हर-त्यौहार पर घर के मुख्यद्वार पर सिन्दूर से शुभ-लाभ लिखा जाता है। जिससे घर पर किसी की बुरी नजर नहीं लगती और घर में सकारात्मक वातावरण बना रहता है। इसी वजह से मुख्यद्वार पर स्वस्तिक बनाने व शुभ-लाभ लिखने की परंपरा बनाई गई।

Friday, 28 October 2016

दीवाली पर इनके करे 21 पाठ

श्री महालक्ष्मी अष्टकम

नमस्तेस्तु महामाये श्री पीठे सुर पूजिते !

शंख चक्र गदा हस्ते महालक्ष्मी नमोस्तुते !!

नमस्तेतु गरुदारुढै कोलासुर भयंकरी !

सर्वपाप हरे देवी महालक्ष्मी नमोस्तुते !!

सर्वज्ञे सर्व वरदे सर्व दुष्ट भयंकरी !

सर्वदुख हरे देवी महालक्ष्मी नमोस्तुते !!

सिद्धि बुद्धि प्रदे देवी भक्ति मुक्ति प्रदायनी !

मंत्र मुर्ते सदा देवी महालक्ष्मी नमोस्तुते !!

आध्यंतरहीते देवी आद्य शक्ति महेश्वरी !

योगजे योग सम्भुते महालक्ष्मी नमोस्तुते !!

स्थूल सुक्ष्मे महारोद्रे महाशक्ति महोदरे !

महापाप हरे देवी महालक्ष्मी नमोस्तुते !!

पद्मासन स्थिते देवी परब्रह्म स्वरूपिणी !

परमेशी जगत माता महालक्ष्मी नमोस्तुते !!

श्वेताम्भर धरे देवी नानालन्कार भुषिते !

जगत स्थिते जगंमाते महालक्ष्मी नमोस्तुते!!

महालक्ष्मी अष्टक स्तोत्रं य: पठेत भक्तिमान्नर:!

सर्वसिद्धि मवाप्नोती राज्यम् प्राप्नोति सर्वदा !!

एक कालम पठेनित्यम महापापविनाशनम !

द्विकालम य: पठेनित्यम धनधान्यम समन्वित: !!

त्रिकालम य: पठेनित्यम महाशत्रुविनाषम !

महालक्ष्मी भवेनित्यम प्रसंनाम वरदाम शुभाम !!

दारिद्र्यदहनशिवस्तोत्रं||

दारिद्र्य दहन शिवस्तोत्रं

||विश्वेश्वराय नरकार्णव तारणाय कणामृताय शशिशेखरधारणाय |कर्पूरकान्तिधवलाय जटाधराय दारिद्र्य दुःखदहनाय नमः शिवाय || १||

गौरीप्रियाय रजनीशकलाधराय कालान्तकाय भुजगाधिपकङ्कणाय |गंगाधराय गजराजविमर्दनाय दारिद्र्य दुःखदहनाय नमः शिवाय || २||

भक्तिप्रियाय भवरोगभयापहाय उग्राय दुर्गभवसागरतारणाय |ज्योतिर्मयाय गुणनामसुनृत्यकाय दारिद्र्य दुःखदहनाय नमः शिवाय || ३||

चर्मम्बराय शवभस्मविलेपनाय भालेक्षणाय मणिकुण्डलमण्डिताय |मंझीरपादयुगलाय जटाधराय दारिद्र्य दुःखदहनाय नमः शिवाय || ४||

पञ्चाननाय फणिराजविभूषणाय हेमांशुकाय भुवनत्रयमण्डिताय |आनन्दभूमिवरदाय तमोमयाय दारिद्र्य दुःखदहनाय नमः शिवाय || ५||

भानुप्रियाय भवसागरतारणाय कालान्तकाय कमलासनपूजिताय |नेत्रत्रयाय शुभलक्षण लक्षिताय दारिद्र्य दुःखदहनाय नमः शिवाय || ६||

रामप्रियाय रघुनाथवरप्रदाय नागप्रियाय नरकार्णवतारणाय |पुण्येषु पुण्यभरिताय सुरार्चिताय दारिद्र्य दुःखदहनाय नमः शिवाय || ७||

मुक्तेश्वराय फलदाय गणेश्वराय गीतप्रियाय वृषभेश्वरवाहनाय |मातङ्गचर्मवसनाय महेश्वराय दारिद्र्य दुःखदहनाय नमः शिवाय || ८||

वसिष्ठेन कृतं स्तोत्रं सर्वरोगनिवारणं |सर्वसंपत्करं शीघ्रं पुत्रपौत्रादिवर्धनम् |त्रिसंध्यं यः पठेन्नित्यं स हि स्वर्गमवाप्नुयात् || ९||||

इति श्रीवसिष्ठविरचितं दारिद्र्यदहनशिवस्तोत्रं सम्पूर्णम् ||

कथा बहुत अच्छी है जरूर पढिये 👇🏻

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लक्ष्मीजी की बडी बहन दरीद्रा (ज्येष्ठा) का निवास एवं कथा :--
कार्तिकमास की द्वादशी तिथि को पिता समुद्र ने दरिद्रादेवी का कन्यादान कर दिया। विवाह के बाद दु:सह ऋषि जब दरिद्रा को लेकर अपने आश्रम पर आए तो उनके आश्रम में वेदमन्त्र गुंजायमान हो रहे थे। वहां से ज्येष्ठा दोनों कान बंद कर भागने लगी। यह देखकर दु:सह मुनि उद्विग्न हो गये क्योंकि उन दिनों सब जगह धर्म की चर्चा और पुण्यकार्य हुआ करते थे। सब जगह वेदमन्त्रों और भगवान के गुणगान से बचकर भागते-भागते दरिद्रा थक गई। तब दरिद्रा ने मुनि से कहा–’जहां वेदध्वनि, अतिथि-सत्कार, यज्ञ-दान, भस्म लगाए लोग आदि हों, वहां मेरा निवास नहीं हो सकता। अत: आप मुझे किसी ऐसे स्थान पर ले चलिए जहां इन कार्यों के विपरीत कार्य होता हो।’
दु:सह मुनि उसे निर्जन वन में ले गए। वन में दु:सह मुनि को मार्कण्डेय ऋषि मिले। दु:सह मुनि ने मार्कण्डेय ऋषि से पूछा कि ‘इस भार्या के साथ मैं कहां रहूं और कहां न रहूं?’

दरिद्रा के प्रवेश करने के स्थान :-

मार्कण्डेय ऋषि ने दु:सह मुनि से कहा–* जिसके यहां शिवलिंग का पूजन न होता हो तथा जिसके यहां जप आदि न होते हों बल्कि रुद्रभक्ति की निन्दा होती हो, वहीं पर तुम निर्भय होकर घुस जाना।

जहां * पति-पत्नी परस्पर झगड़ा करते हों, * घर में रात्रि के समय लोग झगड़ा करते हों, * जो लोग बच्चों को न देकर स्वयं भोज्य पदार्थ खा लेते हों, * जो स्नान नहीं करते, दांत-मुख साफ नहीं करते, * गंदे कपड़े पहनते, संध्याकाल में सोते व खाते हों, * जुआ खेलते हों, * ब्राह्मण के धन का हरण करते हों, * परायी स्त्री से सम्बन्ध रखते हों, * हाथ-पैर न धोते हों, उस घर में तुम दोनों घुस जाओ।

दरिद्रा के प्रवेश न करने के स्थान :-

मार्कण्डेयजी ने दु:सह मुनि को  कहा–* जहां नारायण व रुद्र के भक्त हों, * भस्म लगाने वाले लोग हों, * भगवान का कीर्तन होता हो, * घर में भगवान की मूर्ति व गाये हों उस घर में तुम दोनों मत घुसना। * जो लोग नित्य वेदाभ्यास में संलग्न हों, * नित्यकर्म में तत्पर हों तथा वासुदेव की पूजा में रत हों, उन्हें दूर से ही त्याग देना।

तथा * जो लोग वैदिकों, ब्राह्मणों, गौओं, गुरुओं, अतिथियों तथा रुद्रभक्तों की नित्य पूजा करते हैं, उनके पास मत जाना।

यह कहकर मार्कण्डेय ऋषि चले गए। तब दु:सह मुनि ने दरिद्रा को एक पीपल के मूल में बिठाकर कहा कि मैं तुम्हारे लिए रसातल जाकर उपयुक्त आवास की खोज करता हूँ। दरिद्रा ने कहा–’तब तक मैं खाऊंगी क्या?’ मुनि ने कहा–’तुम्हें प्रवेश के स्थान तो मालूम हैं, वहां घुसकर खा-पी लेना। लेकिन जो स्त्री तुम्हारी पुष्प व धूप से पूजा करती हो, उसके घर में मत घुसना।’

यह कहकर मुनि बिल मार्ग से रसातल में चले गए। लेकिन बहुत खोजने पर भी उन्हें कोई स्थान नहीं मिला। कई दिनों तक पीपल के मूल में बैठी रहने से भूख-प्यास से व्याकुल होकर दरिद्रा रोने लगीं। उनके रुदन से सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में हाहाकार मच गया। उनके रोने की आवाज को जब उनकी छोटी बहन लक्ष्मीजी ने सुना तो वे भगवान विष्णु के साथ उनसे मिलने आईं। दरिद्रा ने भगवान विष्णु से कहा–’मेरे पति रसातल में चले गए है, मैं अनाथ हो गई हूँ, मेरी जीविका का प्रबन्ध कर दीजिए।’

भगवान विष्णु ने कहा–’हे दरिद्रे! जो माता पार्वती, शंकरजी व मेरे भक्तों की निन्दा करते हैं; शंकरजी की निन्दा कर मेरी पूजा करते हैं, उनके धन पर तुम्हारा अधिकार है। तुम सदा पीपल (अश्वत्थ) वृक्ष के मूल में निवास करो। तुमसे मिलने के लिए मैं लक्ष्मी के साथ प्रत्येक शनिवार को यहां आऊंगा और उस दिन जो अश्वत्थ वृक्ष का पूजन करेगा, मैं उसके घर लक्ष्मी के साथ निवास करुंगा।’ उस दिन से दरिद्रादेवी पीपल के नीचे निवास करने लगीं।

देवताओं द्वारा दरिद्रा को दिए गए निवासयोग्य स्थान :-

पद्मपुराण के उत्तरखण्ड में बताया गया है–* जिसके घर में सदा कलह होता हो, * जो झूठ और कड़वे वचन बोलते हैं, * जो मलिन बुद्धि वाले हैं व * संध्या के समय सोते व भोजन करते हैं, * बहुत भोजन करते हैं, * मद्यपान में लगे रहते हैं, * बिना पैर धोये जो आचमन या भोजन करते हैं, * बालू, नमक या कोयले से दांत साफ करते हैं, * जिनके घर में कपाल, हड्डी, केश व भूसी की आग जलती हो, * जो छत्राक (कुकुरमुत्ता) तथा सड़ा हुआ बेल खाते हैं, * जहां गुरु, देवता, पितर और अतिथियों का पूजन तथा यज्ञदान न होता हो, * ब्राह्मण, सज्जन व वृद्धों की पूजा न होती हो, * जहां द्यूतक्रीडा होती हो, * जो दूसरों के धन व स्त्री का अपहरण करते हों, वहां अशुभ दरिद्रे तुम सदा निवास करना।
|| ओम नमः शिवाय ||

नरक चतुर्दशी

नरक चतुर्दशी (छोटी दिवाली) 29 October 2016, शनिवार
तिथि : चतुर्दशी
नक्षत्र : चित्रा (स्वामी त्वष्टा)
योग : विष्कम्भ योग 21:11 तक
सूर्य राशि : तुला
चन्द्र राशि : कन्या 19:36 तक
राहुकाल : 09:19 से 10:41
अभ्यंग स्नान मुहूर्त: सुबह 05:04 से 06:34 के बीच

आज के दिन भगवान श्री कृष्ण ने नरकासुर का वध किया था। कुछ लोग आज के दिन अकाल मृत्यु के भय से मुक्त होने के लिए यमराज का भी पूजन करते हैं।

अभ्यंग स्नान तथा लौकी/अपामार्ग का प्रोक्षण

एक पौराणिक कथा के अनुसार नरक चतुर्दशी के दिन भगवान श्री कृष्ण ने नरकासुर का वध किया था तथा मरते समय नरकासुर ने भगवान श्रीकृष्ण से वर मांगा, कि ‘आजके दिन मंगल स्नान करने वाला नरक की यातनाओंसे बच जाए ।' तदनुसार भगवान श्रीकृष्णने उसे वर दिया । इसलिए इस दिन सूर्योदयसे पूर्व अभ्यंगस्नान करनेकी प्रथा है ।

प्रात: सूर्योदय से पूर्व उठकर शौचादि से निवृत्त हो तेल मालिश, उबटन करें। तिल के तेल में बेसन मिलाकर शरीर पर मलें। उसके बाद एक लौकी (घीया) तथा अपामार्ग को अपने सिर से सात बार घुमायें। घुमाते समय निम्न श्लोक संस्कृत या हिंदी में ही बोलें “सितालोष्ठसमायुक्तं सकण्टकलदलान्वितं । हर पापमपामार्ग भ्राम्यमाणः पुनः पुनः ॥” ‘हे तुंबी , हे अपामार्ग तुम बारबार फिराए ( घुमाए ) जाते हुए , मेरे पापों को दूर करो और मेरी कुबुद्धि का नाश कर दो ।’ उसके बाद जल से स्नान करें। जल में केसर, गंगाजल मिला लें। इसको अभ्यंग स्नान कहते हैं. “तैले लक्ष्मी: जले गंगा दीपावल्या चतुर्दशीम्। ” रूप चतुर्दशी के दिन तेल में लक्ष्मी का वास और जल में गंगा की पवित्रता होती है। स्नान के उपरान्त देवताओं का पूजन तथा दीपदान करें। लौकी/अपामार्ग को किसी पेड के नीचे रख आएं (अगर संभव हो तो दक्षिण दिशा में)। अभ्यंग स्नान के पश्चात पत्नी सहित विष्णु मंदिर और कृष्ण मंदिर में भगवान का दर्शन करना अत्यंत पुण्यदायक कहा गया है। इससे व्यक्ति के समस्त पाप कटते है, रूप सौन्दर्य की प्राप्ति होती है (इसलिए इसको रूप चतुर्दशी कहते हैं), शरीर निरोगी होता है तथा नरक का भय दूर होता है।

अभ्यंग स्नान के बाद सबसे पहले लक्ष्मी विष्णु की प्रतिमा अथवा फोटो को कमलगट्टे की माला और पीले पुष्प अर्पित करें, धन लाभ होगा।

हनुमान जन्मोत्सव

आज के दिन कार्तिक (अमान्त आश्विन) कृष्ण चतुर्दशी भौमवार की महानिशा में, स्वाति नक्षत्र, मेष लग्न में अंजनादेवी के गर्भ से रामभक्त हनुमानजी का जन्म हुआ था ।

अर्थात् अञ्जनादेवी के गर्भ से हनुमान जी का जन्म हुआ था।

हालांकि चैत्र शुक्ल पूर्णिमा को हनुमान जयंती सर्वविदित है। हनूमान भक्त को इस दिन उपवास करना चाहिए । दोपहर में हनूमान् जी पर सिन्दूर में सुगन्धित तेल या घी मिलाकर उसका लेप (चोला) करना चाहिए (कहते है की इसी दिन माता सीता ने हनुमान जी को सिंदूर प्रदान किया था तभी से हनुमान जी पर सिंदूर अर्पित किया जाने लगा है)। तदुपरान्त चॉंदी के वर्क लगाने चाहिए । चोला चढ़ाने के उपरान्त हनूमान् जी का षोडशोपचार पूजन करना चाहिए । हनुमान चालीसा, राम रक्षा स्तोत्र, सुंदर कांड का पाठ करें।

नरक चतुर्दशी तथा दीपदान

इस दिन देवी लक्ष्मी, भगवान गणेश का पूजन करके 13 दीपकों के मध्य चार बातियों वाला एक तेल का दीपक रखकर उसकी चारों बातियों को प्रज्वलित करना चाहिए एवं दीपमालिका का पूजन करके उन दीपों को घर में प्रत्येक स्थान पर रखें एवं चार बातियों वाला दीपक रातभर जलता रहे ऐसा प्रयास करें।
365 बत्ती का दीपक अपने घर के दरवाजे पर या मंदिर मैं जलावें.
नरक चतुर्दशी को संध्या के समय घर की पश्चिमी दिशा में खुले स्थान पर अथवा छत के पश्चिम में 14 दीपक पूर्वजों के नाम से जलाएं। उनके आशीर्वाद से समृद्धि प्राप्त होगी।

Astro Shaliini
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