Tuesday, 30 June 2020

तुलसी नामाष्टक

तुलसी विष्णु प्रिया हैं। कार्तिक में तो तुलसी पूजा का महत्व और भी बढ़ जाता है। अगर कोई अपने मन की बात, भगवान को सीधे न कह सके, तो वह तुलसी के माध्यम से अपनी बात, भगवान तक पहुंचा सकता है। भगवान कृष्ण भी किसी की बात सुनें या न सुनें, लेकिन तुलसी जी की बात, हर हाल में सुनते हैं। तो अगर आपको सुख, दु:ख भगवान से शेयर करना हो तो उसके लिये पुराणों में बताई गई विधि से, तुलसी माता की पूजा करनी होगी। इसी विधि से भगवान श्रीहरि विष्णु ने भी तुलसी को प्रसन्न किया थाभगवान श्रीकृष्ण को तुलसी महारानी अत्यधिक प्रिय है । श्रीकृष्ण की सभी पूजाओं में तुलसी अर्पित की जाती है । तुलसी पूजा करने के कई विधान दिए गए हैं । उनमें से एक तुलसी नामाष्टक का पाठ करने का विधान दिया गया है । जो व्यक्ति तुलसी नामाष्टक का नियमित पाठ करता है उसे अश्वमेघ यज्ञ के समान पुण्य फल मिलता है । इस नामाष्टक का पाठ पूरे विधान से करना चाहिए, विशेष रुप से कार्तिक माह में इस पाठ को अवश्य ही करना चाहिए !!

तुलसी नामाष्टक मंत्र : 
 
वृंदा वृंदावनी विश्वपूजिता विश्वपावनी।
पुष्पसारा नंदनीय तुलसी कृष्ण जीवनी।।
 
एतभामांष्टक चैव स्त्रोतं नामर्थं संयुतम।
य: पठेत तां च सम्पूज्य सौश्रमेघ फलंलमेता।।


अर्थात् हे वृंदा! आप वृंदावनी, विश्वपूजिता, विश्वपावनी, पुष्पसारा, नंदनीय, तुलसी, कृष्ण जीवनी हो।आपको नमस्कार है। श्री तुलसी के पूजन के समय जो इन 8 नामों का पाठ करता है। वह अश्वमेघ यज्ञ के फल को प्राप्त करता है।

Thursday, 25 June 2020

सोलह महादान कौन-से हैं

*जानें, सोलह महादान कौन-से हैं ? क्यों कलिकाल में तुलादान के समान कोई दान नहीं है ? सभी प्रकार के कष्टों का एक समाधान , तुलादान

सोलह महादानों में पहला महादान तुला दान या तुलापुरुष दान है । तुलादान अत्यन्त पौराणिक काल से प्रचलन में है । सबसे पहले भगवान श्रीकृष्ण ने तुलादान किया था, उसके बाद राजा अम्बरीष, परशुरामजी, भक्त प्रह्लाद आदि ने इसे किया । कलिकाल में यह तुलादान प्राय: काफी प्रचलन में है ।

हिन्दू संस्कृति में दान और त्याग मुख्य हैं जबकि आसुरी संस्कृति में भोग और संचय की प्रधानता रहती है ।  पुराणों व स्मृतियों में सोलह महादान बताए गए हैं—

तुलादान या तुलापुरुष दान,हिरण्यगर्भ दान,ब्रह्माण्ड दान,कल्पवृक्ष दान,गोसहस्त्र दान,हिरण्यकामधेनु दान,हिरण्याश्व दान,हिरण्याश्वरथ दान,हेमहस्तिरथ दान,पंचलांगलक दान,धरा दान,विश्वचक्र दान,कल्पलता दान,सप्तसागर दान,रत्नधेनु दान तथा,महाभूतघट दान

ये दान सामान्य दान नहीं है, अपितु सर्वश्रेष्ठ दान हैं । ये सभी दान सामान्य आर्थिक स्थिति वालों के लिए संभव नहीं है । इनमें से एक भी दान यदि किसी के द्वारा सम्पन्न हो जाए तो उसका जीवन ही सफल हो जाता है । जो निष्काम भाव से इन सोलह महादानों को करता है, उसे पुन: इस संसार में जन्म नहीं लेना पड़ता है, वह मुक्त हो जाता है ।

तुलादान या तुलापुरुष दान!!!!!!!!!!

सोलह महादानों में पहला महादान तुलादान या तुलापुरुष दान है । तुलादान अत्यन्त पौराणिक काल से प्रचलन में है । सबसे पहले भगवान श्रीकृष्ण ने तुलादान किया था, उसके बाद राजा अम्बरीष, परशुरामजी, भक्त प्रह्लाद आदि ने इसे किया । कलिकाल में यह तुलादान प्राय: काफी प्रचलन में है । 

 इसमें तुला की एक ओर तुला दान करने वाला तथा दूसरी ओर दाता के भार के बराबर की वस्तु तौल कर ब्राह्मण को दान में दी जाती है । तुला दान में इन्द्रादि आठ लोकपालों का विशेष पूजन होता है । तुलादान करने वाला अंजलि में पुष्प लेकर तुला की तीन परिक्रमा इन मन्त्रों का उच्चारण करके करता है—

नमस्ते सर्वभूतानां साक्षिभूते सनातनि । 
पितामहेन देवि त्वं निर्मिता परमेष्ठिना ।। 
त्वया धृतं जगत्सर्वं सहस्थावरजंगमम् । 
सर्वभूतात्मभूतस्थे नमस्ते विश्वधारिणि ।।

‘हे तुले ! तुम पितामह ब्रह्माजी द्वारा निर्मित हुई हो । तुम्हारे एक पलड़े पर सभी सत्य हैं और दूसरे पर सौ असत्य हैं । धर्मात्मा और पापियों के बीच तुम्हारी स्थापना हुई है । मुझे तौलती हुई तुम इस संसार से मेरा उद्धार कर दो । तुलापुरुष नामधारी गोविन्द आपको मेरा बारम्बार नमस्कार है ।’

ऐसा कहकर दानदाता तुला के एक तरफ बैठ जाए और ब्राह्मणगण तुला के दूसरे पलड़े पर दान की जाने वाली वस्तु को तब तक रखते जाएं, जब तक कि तराजू का पलड़ा भूमि को स्पर्श न कर ले ।

तुलादान में ध्यान रखने योग्य बात!!!!!!!

इसके बाद तुला से उतरकर दानदाता को तौले गए दान की गयी वस्तु तुरन्त ब्राह्मणों को दे देनी चाहिए । देर तक घर में रखने से दानदाता को भय, व्याधि तथा शोक की प्राप्ति होती है । शीघ्र ही दान दे देने से मनुष्य को उत्तम फल की प्राप्ति होती है ।

किन वस्तुओं का होता है तुलादान ?

प्राचीन समय में मनुष्य के शरीर के भार के बराबर स्वर्ण तौला जाता था किन्तु कलियुग का स्वर्ण अन्न है, इसलिए कलियुग में स्वर्ण के स्थान पर सप्त धान्य या अन्न से तौला जाता है ।

रोगों की शान्ति के लिए भगवान मृत्युंजय को प्रसन्न करने के लिए लौहे से तुलादान किया जाता है ।

विभिन्न कामनाओं की पूर्ति के लिए!!!!!!

रत्न,चांदी,लोहा आदि धातु,घी,लवण (नमक),गुड़,चीनी,️चंदन,कुमकुम,वस्त्र,सुगन्धित द्रव्य,कपूर,फल व विभिन्न अन्नों से तुलादान किया जाता है ।

सौभाग्य की इच्छा रखने वाली स्त्री को कृष्ण पक्ष की तृतीया को कुंकुम, लवण (नमक) और गुड़ का तुलादान करना चाहिए ।

तुलादान की महिमा!!!!!!!!!!!

तुलादान करने से मनुष्य ब्रह्महत्या, गोहत्या, पितृहत्या व झूठी गवाही जैसे अनेक पापों से मुक्त होकर परम पवित्र हो जाता है ।

आधि-व्याधि, ग्रह-पीड़ा व दरिद्रता के निवारण के लिए तुलादान बहुत श्रेष्ठ माना जाता है । इसको करने से  मनुष्य को अपार मानसिक शान्ति प्राप्त होती है ।

यदि नि:स्वार्थभाव से भगवान की प्रसन्नता प्राप्त करने के लिए भगवदर्पण-बुद्धि से तुलादान किया जाए तो तुलापुरुष का दान करने वाले को विष्णुलोक की प्राप्ति होती है । अनेक कल्पों तक वहां रहकर जब पुण्यों के क्षय होने पर पुन: जन्म लेता है तो धर्मात्मा राजा बनता है ।

इतना ही नहीं, इस प्रसंग को पढ़ने-सुनने या तुलादान को देखने या स्मरण करने से भी मनुष्य को दिव्य लोक की प्राप्ति होती है ।

यदि किसी कामना से तुलादान किया जाए तो वह दाता की मनोकामना पूर्ति में सहायक होता है ।

किस स्थान पर करें तुलादान ?

तीर्थस्थान में, मन्दिर, गौशाला, बगीचा, पवित्र नदी के तट पर, अपने घर पर, पवित्र तालाब के किनारे या किसी पवित्र वन में

Friday, 29 May 2020

झूठे मुकदमों तथा पुलिस कार्रवाई से ऎसे पीछा छुड़ाएं

झूठे मुकदमों तथा पुलिस कार्रवाई से ऎसे पीछा छुड़ाएं
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अगर आप बेगुनाह हैं
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 आपको किसी ने इलज़ाम लगाकर फंसा दिया हैं तो आप ये उपाय करें जिससे आप रिहा हो जायँगे।

लाल रुमाल
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अगर जमानत नहीं हो रही है तो आप उनकी जेब में लाल रंग का रुमाल रख देवें वह रुमाल हमेशा उनके पास रहे जब तक कि वह रिहा नहीं होते। 

मूली को उड़ाएं कफ़न
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सात मूलियां लेकर उसे शनिवार की रात को धोकर उस व्यक्ति के सोने वाले कमरे पैर पलंग के नीचे सफ़ेद कपड़े से ओढ़ाकर  रख देवें और दूसरे दिन जाकर किसी गरीब को दान कर दें।

शराब करें दान
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सात छोटी काले रंग की शराब की शीशी लेवें और जिस व्यक्ति पर झूठा आरोप लगा है उसकी फोटो के ऊपर 7 बार घुमाकर ये बोतलें किसी सुनसान जगह पर बहने वाली नदी में जाकर बहा देवें। ऐसा 7 शनिवार तक करें। 

करें बजरंग बाण का पाठ
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जिस व्यक्ति पर जेल का खतरा मंडरा रहा हो उसके
नाम का संकल्प लेकर बजरंग बाण का पाठ करें। बालाजी भगवान से उनकी रिहाई की प्रार्थना करें।


Saturday, 11 April 2020

गणपति अथर्वशीर्ष पाठ



प्रतिदिन पढ़ेंगे श्री गणपति अथर्वशीर्ष पाठ तो बदल जाएगी किस्मत (पढ़ें हिन्दी अर्थ‍सहित)


श्रीगणेशजी की आराधना बहुत मंगलकारी मानी जाती है। अनेक श्लोक, स्तोत्र, जाप द्वारा गणेशजी को मनाया जाता है। इनमें से एक पाठ 'गणपति अथर्वशीर्ष' बहुत मंगलकारी है।

प्रतिदिन प्रात: शुद्ध होकर इस पाठ करने से गणेशजी की कृपा अवश्य प्राप्त होती है। यहां पाठकों के लिए पेश है गणपति अथर्वशीर्ष का हिन्दी अनुवाद सहित पाठ-
 
 
श्री गणपति अथर्वशीर्ष
 
ॐ नमस्ते गणपतये।

त्वमेव प्रत्यक्षं तत्वमसि
त्वमेव केवलं कर्ताऽ सि
त्वमेव केवलं धर्ताऽसि
त्वमेव केवलं हर्ताऽसि
त्वमेव सर्वं खल्विदं ब्रह्मासि
त्व साक्षादात्माऽसि नित्यम्।।1।।
 
अर्थ- ॐकारापति भगवान गणपति को नमस्कार है। हे गणेश! तुम्हीं प्रत्यक्ष तत्व हो। तुम्हीं केवल कर्ता हो। तुम्हीं केवल धर्ता हो। तुम्हीं केवल हर्ता हो। निश्चयपूर्वक तुम्हीं इन सब रूपों में विराजमान ब्रह्म हो। तुम साक्षात नित्य आत्मस्वरूप हो।
 
ऋतं वच्मि। सत्यं वच्मि।।2।।
 
मैं ऋत न्याययुक्त बात कहता हूं। सत्य कहता हूं।
 
अव त्व मां। अव वक्तारं।
अव श्रोतारं। अव दातारं।
अव धातारं। अवानूचानमव शिष्यं।
अव पश्चातात। अव पुरस्तात।
अवोत्तरात्तात। अव दक्षिणात्तात्।
अवचोर्ध्वात्तात्।। अवाधरात्तात्।।
सर्वतो मां पाहि-पाहि समंतात्।।3।।
 
हे पार्वतीनंदन! तुम मेरी (मुझ शिष्य की) रक्षा करो। वक्ता (आचार्य) की रक्षा करो। श्रोता की रक्षा करो। दाता की रक्षा करो। धाता की रक्षा करो। व्याख्या करने वाले आचार्य की रक्षा करो। शिष्य की रक्षा करो। पश्चिम से रक्षा। पूर्व से रक्षा करो। उत्तर से रक्षा करो। दक्षिण से रक्षा करो। ऊपर से रक्षा करो। नीचे से रक्षा करो। सब ओर से मेरी रक्षा करो। चारों ओर से मेरी रक्षा करो।
 
त्वं वाङ्‍मयस्त्वं चिन्मय:।
त्वमानंदमसयस्त्वं ब्रह्ममय:।
त्वं सच्चिदानंदाद्वितीयोऽषि।
त्वं प्रत्यक्षं ब्रह्माषि।
त्वं ज्ञानमयो विज्ञानमयोऽषि।।4।।
 
तुम वाङ्‍मय हो, चिन्मय हो। तुम आनंदमय हो। तुम ब्रह्ममय हो। तुम सच्चिदानंद अद्वितीय हो। तुम प्रत्यक्ष ब्रह्म हो। तुम दानमय विज्ञानमय हो।
 
सर्वं जगदिदं त्वत्तो जायते।
सर्वं जगदिदं त्वत्तस्तिष्ठति।
सर्वं जगदिदं त्वयि लयमेष्यति।
सर्वं जगदिदं त्वयि प्रत्येति।
त्वं भूमिरापोऽनलोऽनिलो नभ:।
त्वं चत्वारिकाकूपदानि।।5।।
 
यह जगत तुमसे उत्पन्न होता है। यह सारा जगत तुममें लय को प्राप्त होगा। इस सारे जगत की तुममें प्रतीति हो रही है। तुम भूमि, जल, अग्नि, वायु और आकाश हो। परा, पश्चंती, बैखरी और मध्यमा वाणी के ये विभाग तुम्हीं हो। 
 
त्वं गुणत्रयातीत: त्वमवस्थात्रयातीत:।
त्वं देहत्रयातीत:। त्वं कालत्रयातीत:।
त्वं मूलाधारस्थितोऽसि नित्यं।
त्वं शक्तित्रयात्मक:।
त्वां योगिनो ध्यायंति नित्यं।
त्वं ब्रह्मा त्वं विष्णुस्त्वं
रूद्रस्त्वं इंद्रस्त्वं अग्निस्त्वं
वायुस्त्वं सूर्यस्त्वं चंद्रमास्त्वं
ब्रह्मभूर्भुव:स्वरोम्।।6।।
 
तुम सत्व, रज और तम तीनों गुणों से परे हो। तुम जागृत, स्वप्न और सुषुप्ति इन तीनों अवस्थाओं से परे हो। तुम स्थूल, सूक्ष्म औ वर्तमान तीनों देहों से परे हो। तुम भूत, भविष्य और वर्तमान तीनों कालों से परे हो। तुम मूलाधार चक्र में नित्य स्थित रहते हो। इच्छा, क्रिया और ज्ञान तीन प्रकार की शक्तियाँ तुम्हीं हो। तुम्हारा योगीजन नित्य ध्यान करते हैं। तुम ब्रह्मा हो, तुम विष्णु हो, तुम रुद्र हो, तुम इन्द्र हो, तुम अग्नि हो, तुम वायु हो, तुम सूर्य हो, तुम चंद्रमा हो, तुम ब्रह्म हो, भू:, र्भूव:, स्व: ये तीनों लोक तथा ॐकार वाच्य पर ब्रह्म भी तुम हो।
 
गणादि पूर्वमुच्चार्य वर्णादिं तदनंतरं।
अनुस्वार: परतर:। अर्धेन्दुलसितं।
तारेण ऋद्धं। एतत्तव मनुस्वरूपं।
गकार: पूर्वरूपं। अकारो मध्यमरूपं।
अनुस्वारश्चान्त्यरूपं। बिन्दुरूत्तररूपं।
नाद: संधानं। सँ हितासंधि:
सैषा गणेश विद्या। गणकऋषि:
निचृद्गायत्रीच्छंद:। गणपतिर्देवता।
ॐ गं गणपतये नम:।।7।।
 
गण के आदि अर्थात 'ग्' कर पहले उच्चारण करें। उसके बाद वर्णों के आदि अर्थात 'अ' उच्चारण करें। उसके बाद अनुस्वार उच्चारित होता है। इस प्रकार अर्धचंद्र से सुशोभित 'गं' ॐकार से अवरुद्ध होने पर तुम्हारे बीज मंत्र का स्वरूप (ॐ गं) है। गकार इसका पूर्वरूप है।बिन्दु उत्तर रूप है। नाद संधान है। संहिता संविध है। ऐसी यह गणेश विद्या है। इस महामंत्र के गणक ऋषि हैं। निचृंग्दाय छंद है श्री मद्महागणपति देवता हैं। वह महामंत्र है- ॐ गं गणपतये नम:।
 
एकदंताय विद्‍महे।
वक्रतुण्डाय धीमहि।
तन्नो दंती प्रचोदयात।।8।।
 
एक दंत को हम जानते हैं। वक्रतुण्ड का हम ध्यान करते हैं। वह दन्ती (गजानन) हमें प्रेरणा प्रदान करें। यह गणेश गायत्री है।
 
एकदंतं चतुर्हस्तं पाशमंकुशधारिणम्।
रदं च वरदं हस्तैर्विभ्राणं मूषकध्वजम्।
रक्तं लंबोदरं शूर्पकर्णकं रक्तवाससम्।
रक्तगंधाऽनुलिप्तांगं रक्तपुष्पै: सुपुजितम्।।
भक्तानुकंपिनं देवं जगत्कारणमच्युतम्।
आविर्भूतं च सृष्टयादौ प्रकृ‍ते पुरुषात्परम्।
एवं ध्यायति यो नित्यं स योगी योगिनां वर:।।9।।
 
एकदंत चतुर्भज चारों हाथों में पाक्ष, अंकुश, अभय और वरदान की मुद्रा धारण किए तथा मूषक चिह्न की ध्वजा लिए हुए, रक्तवर्ण लंबोदर वाले सूप जैसे बड़े-बड़े कानों वाले रक्त वस्त्रधारी शरीर प रक्त चंदन का लेप किए हुए रक्तपुष्पों से भलिभाँति पूजित। भक्त पर अनुकम्पा करने वाले देवता, जगत के कारण अच्युत, सृष्टि के आदि में आविर्भूत प्रकृति और पुरुष से परे श्रीगणेशजी का जो नित्य ध्यान करता है, वह योगी सब योगियों में श्रेष्ठ है।
 
नमो व्रातपतये। नमो गणपतये।
नम: प्रमथपतये।
नमस्तेऽस्तु लंबोदरायैकदंताय।
विघ्ननाशिने शिवसुताय।
श्रीवरदमूर्तये नमो नम:।।10।।
 
व्रात (देव समूह) के नायक को नमस्कार। गणपति को नमस्कार। प्रथमपति (शिवजी के गणों के अधिनायक) के लिए नमस्कार। लंबोदर को, एकदंत को, शिवजी के पुत्र को तथा श्रीवरदमूर्ति को नमस्कार-नमस्कार ।।10।। 
 
एतदथर्वशीर्ष योऽधीते।
स ब्रह्मभूयाय कल्पते।
स सर्व विघ्नैर्नबाध्यते।
स सर्वत: सुखमेधते।
स पञ्चमहापापात्प्रमुच्यते।।11।।
 
यह अथर्वशीर्ष (अथर्ववेद का उप‍‍‍निषद) है। इसका पाठ जो करता है, ब्रह्म को प्राप्त करने का अधिकारी हो जाता है। सब प्रकार के विघ्न उसके लिए बाधक नहीं होते। वह सब जगह सुख पाता है। वह पांचों प्रकार के महान पातकों तथा उपपातकों से मुक्त हो जाता है।
 
सायमधीयानो दिवसकृतं पापं नाशयति।
प्रातरधीयानो रात्रिकृतं पापं नाशयति।
सायंप्रात: प्रयुंजानोऽपापो भवति।
सर्वत्राधीयानोऽपविघ्नो भवति।
धर्मार्थकाममोक्षं च विंदति।।12।।
 
सायंकाल पाठ करने वाला दिन के पापों का नाश करता है। प्रात:काल पाठ करने वाला रात्रि के पापों का नाश करता है। जो प्रात:- सायं दोनों समय इस पाठ का प्रयोग करता है वह निष्पाप हो जाता है। वह सर्वत्र विघ्नों का नाश करता है। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को प्राप्त करता है।
 
इदमथर्वशीर्षमशिष्याय न देयम्।
यो यदि मोहाद्‍दास्यति स पापीयान् भवति।
सहस्रावर्तनात् यं यं काममधीते तं तमनेन साधयेत्।13।।
 
इस अथर्वशीर्ष को जो शिष्य न हो उसे नहीं देना चाहिए। जो मोह के कारण देता है वह पातकी हो जाता है। सहस्र (हजार) बार पाठ करने से जिन-जिन कामों-कामनाओं का उच्चारण करता है, उनकी सिद्धि इसके द्वारा ही मनुष्य कर सकता है।
 
अनेन गणपतिमभिषिंचति
स वाग्मी भवति
चतुर्थ्यामनश्र्नन जपति
स विद्यावान भवति।
इत्यथर्वणवाक्यं।
ब्रह्माद्यावरणं विद्यात्
न बिभेति कदाचनेति।।14।।
 
इसके द्वारा जो गणपति को स्नान कराता है, वह वक्ता बन जाता है। जो चतुर्थी तिथि को उपवास करके जपता है वह विद्यावान हो जाता है, यह अथर्व वाक्य है जो इस मं‍त्र के द्वारा तपश्चरण करना जानता है वह कदापि भय को प्राप्त नहीं होता।
 
यो दूर्वांकुरैंर्यजति
स वैश्रवणोपमो भवति।
यो लाजैर्यजति स यशोवान भवति
स मेधावान भवति।
यो मोदकसहस्रेण यजति
स वाञ्छित फलमवाप्रोति।
य: साज्यसमिद्भिर्यजति
स सर्वं लभते स सर्वं लभते।।15।।
 
जो दूर्वांकुर के द्वारा भगवान गणपति का यजन करता है वह कुबेर के समान हो जाता है। जो लाजो (धानी-लाई) के द्वारा यजन करता है वह यशस्वी होता है, मेधावी होता है। जो सहस्र (हजार) लड्डुओं (मोदकों) द्वारा यजन करता है, वह वांछित फल को प्राप्त करता है। जो घृत के सहित समिधा से यजन करता है, वह सब कुछ प्राप्त करता है।
 
अष्टौ ब्राह्मणान् सम्यग्ग्राहयित्वा
सूर्यवर्चस्वी भवति।
सूर्यग्रहे महानद्यां प्रतिमासंनिधौ
वा जप्त्वा सिद्धमंत्रों भवति।
महाविघ्नात्प्रमुच्यते।
महादोषात्प्रमुच्यते।
महापापात् प्रमुच्यते।
स सर्वविद्भवति से सर्वविद्भवति।
य एवं वेद इत्युपनिषद्‍।।16।।
 
आठ ब्राह्मणों को सम्यक रीति से ग्राह कराने पर सूर्य के समान तेजस्वी होता है। सूर्य ग्रहण में महानदी में या प्रतिमा के समीप जपने से मंत्र सिद्धि होती है। वह महाविघ्न से मुक्त हो जाता है। जो इस प्रकार जानता है, वह सर्वज्ञ हो जाता है वह सर्वज्ञ हो जाता है।
 

Monday, 6 April 2020

combination

Planetary combination for Lawyer

1. Rahu is the significator of diplomatic talks which is very much needed for a lawyer. If Rahu is strong in the horoscope and is related to Mercury and with the sixth house or a lord of the sixth house then you can be a successful lawyer.

2. If Venus and Mercury are placed in the same house and a minimum of one planet is exalted with it, then an individual can be a successful lawyer.

3. If Mars is in the first, fifth or ninth house, then an individual can be a successful lawyer.

4. If the moon is in Libra sign or exalted in Navamsa and is aspected by Jupiter, then an individual can be a successful lawyer.


Planetary combination for Judge

1. If Jupiter, Saturn, Mars and the Sun are in the tenth house, then an individual can be a successful judge.

2. If Mercury, Jupiter and Mars are in the tenth house, then an individual can be a successful judge.

3. If the Lagna lord occupies the first Drekkana of the Lagna then an individual can be a successful judge.

Monday, 23 March 2020

श्रीसप्तश्‍लोकी दुर्गा

॥शिव उवाच॥
देवि त्वं भक्तसुलभे सर्वकार्यविधायिनी।
कलौ हि कार्यसिद्ध्यर्थमुपायं ब्रूहि यत्नतः॥

॥देव्युवाच॥
श्रृणु देव प्रवक्ष्यामि कलौ सर्वेष्टसाधनम्‌।
मया तवैव स्नेहेनाप्यम्बास्तुतिः प्रकाश्यते॥

॥विनियोगः॥
ॐ अस्य श्रीदुर्गासप्तश्‍लोकीस्तोत्रमन्त्रस्य नारायण ऋषिः, 
अनुष्टुप्‌ छन्दः, श्रीमहाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वत्यो देवताः, 
श्रीदुर्गाप्रीत्यर्थं सप्तश्‍लोकीदुर्गापाठे विनियोगः।

ॐ ज्ञानिनामपि चेतांसि देवी भगवती हि सा।
बलादाकृष्य मोहाय महामाया प्रयच्छति॥१॥

दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तोः
स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि।
दारिद्र्‌यदुःखभयहारिणि का त्वदन्या
सर्वोपकारकरणाय सदार्द्रचित्ता॥२॥

सर्वमङ्गलमङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके।
शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते॥३॥

शरणागतदीनार्तपरित्राणपरायणे।
सर्वस्यार्तिहरे देवि नारायणि नमोऽस्तु ते॥४॥

सर्वस्वरूपे सर्वेशे सर्वशक्तिसमन्विते।
भयेभ्यस्त्राहि नो देवि दुर्गे देवि नमोऽस्तु ते॥५॥

रोगानशेषानपहंसि तुष्टा रूष्टा तु कामान्‌ सकलानभीष्टान्‌।
त्वामाश्रितानां न विपन्नराणां त्वामाश्रिता ह्याश्रयतां प्रयान्ति॥६॥

सर्वाबाधाप्रशमनं त्रैलोक्यस्याखिलेश्‍वरि।
एवमेव त्वया कार्यमस्मद्वैरिविनाशनम्‌॥७॥

इति श्रीसप्तश्‍लोकी दुर्गा सम्पूर्णा।

Monday, 16 December 2019

EFFECTS OF GULIKA

Here the cusp of the sign rising at the beginning of the Gulika segment is considered as Gulika.

EFFECTS OF GULIKA IN VARIOUS HOUSES (PHALA—DEEPIKA)

First House - Native posses cruel attitude, suffer from eye problems. Hate classical and traditional literature and rituals. Always cursing himself.

Second House - Speaks ill of others. Involve himself in domestic troubles. Face financial hardship.

Third House - Proudy, selfish and remain aloof from society. Fond of drinking and always fighting with siblings.

Fourth House - Lives in dirty atmosphere. Shortage of funds and no pleasure of any conveyance.

Fifth House - Worries on account of children. Dogmatic views and lack higher education.

Sixth House- Involve himself in many vices and suffers from its ill effects. Always troubled by enemies.

Seventh House - Character doubtful and spoils reputation in family circle – Suspicious about spouse.

Eighth House - Life full of unending troubles. Suffer from chronic diseases – speak ill of others. Always threat to longevity.

Ninth House - Suffering due to early death of father. No religious aptitude.

Tenth House - No proper and gainful sources of income. Changing profession and unsuccessful in business.

Eleventh House - Gains from progeny. Plenty of wealth. Luxurious life style.

Twelth House - Poor living. Unable to meet fimily expenses. Depend on others for financial help.

Gulika gives favourable results in upachaya houses like 3 – 6 – 10 and 11. The unavourable results of Gulika are lost when the rashi and Navamsa Lords of Gulika dispositor are debilitated or combust.

 

GULIKA AND NATURAL KARAKA PLANETS

The natural karaka planets when associated with Gulika destroy or diminish good results of that planet.

Gulika and Sun - Harmful to the longevity of Father.

Gulika and Moon - Loss of comforts from mother.

Gulika and Mars  - Adverse family relations with co-borns and suffer from their early death.

Gulika and Mercury - Native remain mentally disturbed.

Gulika and Jupiter - Person misuse the religious feelings of others. Pose himself as religious fanatics.

Gulika and Venus - Suffers due to bad company of doubtful character women and ruins his marital life.

Gulika and Saturn  - Suffer from skin and allergy diseases.

Gulika and Rahu  - Prone to infection and virus diseases.
Gulika and Ketu - Fear from bad characters and criminals.

 

GULIKA AND RAJA YOGAS

Even with many unfavourable traits mentioned above, Gulika posses powers of conferring Raja Yoga like honouring the native with highest position in profession/career, dignity and honour throughout life, political powers leading to holding ministerial post. Name and fame and comforts of luxurious life.

            Phala Deepika Chapter 25 sloka – 18 describe as follows:

गुलिकभवननाथे केन्द्रगे वा त्रिकोणे बलिनि निजगृहस्थे स्वोच्चमित्रस्थिते वा।
रथगजतुरगाणां नायको मारतुल्यो महितपृथुयशास्स्यान्मेदिनीमण्डलेन्द्रः।।

These Raja Yogas will fructify in case the dispositor of Gulika; its Navamsa lords are placed in Kendra or trikona houses or in its own sign or in its exaltation. These avasthas of Gulika dispositor nullify the adverse effects of Gulika and give Raj Yoga results. But its propensity as maraca remain intact.