Wednesday, 5 October 2016

कुंडली मिलान मे योनि फल

कुंडली मिलान में योनिफल

धर्म ग्रंथों में बताया गया है कि इस ब्रह्माण्ड में कुल 84 लाख योनियां हैं, अर्थात संसार में इतने प्रकार के प्राणी मौजूद हैं। मनुष्य योनि को इन सभी योनियों का मध्य माना जाता है। ज्योतिषशास्त्र कहता है कि हम भले ही मनुष्य योनि में जन्म लें लेकिन जिस नक्षत्र में हमारा जन्म होता है हम पर उस नक्षत्र की योनि का प्रभाव पड़ता है। नक्षत्र की योनि के प्रभाव से हमारा स्वभाव, व्यवहार और व्यक्तित्व भी प्रभावित होता है।

योनियाँ चौदह प्रकार की होती है और दो नक्षत्रों को एक योनि के अन्तर्गत रखा गया है.
नक्षत्र के आधार पर योनियों का वर्गीकरण
योनि            नक्षत्र
अश्व             अश्विनी, शतभिष
गज              भरणी, रेवती
मेष               पुष्य, कृतिका
सर्प               रोहिणी, मृ्गशिरा
श्वान             मूल, आर्द्रा
मार्जार           आश्लेषा, पुनर्वसु
मूषक             मघा, पूर्वाफाल्गुनी
गौ                  उत्तरा फाल्गुनी, उत्तराभाद्रपद
महिष             स्वाती, हस्त
व्याघ्र             विशाखा, चित्रा
मृग                ज्येष्ठा, अनुराधा
वानर             पूर्वाषाढ़ा, श्रवण
नकुल             उत्तराषाढ़ा, अभिजीत
सिंह               पूर्वाभाद्रपद, धनिष्ठा

आइये देखते हैं कि किस योनि में व्यक्ति का स्वभाव और व्यक्तित्व कैसा होता है।

1. अश्व योनि: ज्योतिषशास्त्र के अनुसार जिस व्यक्ति का जन्म अश्व योनि में होता है वह व्यक्ति स्वेच्छाचारी अर्थात अपने मन के अनुसार चलने वाला होता है। यह व्यक्ति किसी और का कहा नहीं मानता है, जो भी इनका मन कहता है वे उसी को मानते हैं। इस योनि में जन्म लेने वाले व्यक्ति बहुत ही गुणी होते हैं। ये काफी बहादुर और हिम्मत वाले होते हैं। ये प्रभावशाली और ओजस्वी होते हैं, ये अपने आस-पास के लोगों पर अपना प्रभाव कायम करने में सफल होते हैं। इनका यश दूर दूर तक फैलता है और ये सम्मान प्राप्त करते हैं। इनकी आवाज़ में घरघराहट रहती है।

2. गज योनि: जो व्यक्ति गज योनि में जन्म लेते हैं वे बहुत ही बलवान व शक्तिशाली होते हैं। इस योनि के जातक बहुत ही उत्साही होते हैं। ये हर प्रकार का सांसारिक सुख प्राप्त करते हैं। बड़े-बड़े लोगों एवं प्रतिष्ठित लोगों से इन्हें मान सम्मान एवं आदर प्राप्त होता है।

3. गौ योनि: ज्योतिषशास्त्र के नियमों के अनुसार जिन लोगों का जन्म गौ योनि में होता है वे सदा उत्साहित और आशावादी रहते हैं। ये किसी बात से निराश नहीं होते हैं और सदैव भविष्य की ओर देखते हैं। ये मेहनती होते हैं और परिश्रम से पीछे नहीं हटते हैं। इस योनि के जातक बातों में निपुण होते हें, अपनी बातों से ये लोगों का दिल जीतना खूब जानते हैं। ये व्यक्ति स्त्रियों को प्रिय होते हैं यानी स्त्रियां इनकी ओर आर्किषत रहती हैं। इस आयु के जातक की आयु कम रहती है।

4. सर्प योनी: जवाब: ज्योतिष मतानुसर जो व्यक्ति सर्प योनि में जन्म लेता है वह व्यक्ति क्रोधी स्वभाव का होता है। इन्हें बहुत अधिक क्रोध और गुस्सा आता है, क्रोध आने पर उसे नियंत्रित कर पाना इनके लिए कठिन होता है। इस योनि के जातक का स्वभाव रूखा होता है, इनमें दया और ममता की कमी होती है। इनका मन अस्थिर और चंचल होता है, ये किसी विषय में अधिक गम्भीरता से नहीं सोच पाते। ये अच्छे -अच्छे खाने और व्यंजन के शौकीन होते हैं। ये किसी के उपकार को नहीं मानते हैं।

5. श्वान योनि: श्वान योनि में जिस व्यक्ति का जन्म होता है। वह व्यक्ति बहुत बहादुर और साहसी होता है। इस योनि के जातक उत्साही और जोश से भरे होते हैं। ये मेहनती और परिश्रमी होते हैं। ये अपने माता-पिता की खूब सेवा करते हैं, उन्हें भगवान की तरह आदर देते हैं। दोस्तों एवं अड़ोस-पड़ोस के लोगों की पूरी पूरी सहायता करने वाला होता है। इनमें एक प्रमुख कमी यह होती है कि ये अपने भाई बंधुओं से छोटी-छोटी बात पर लड़ पड़ते हैं।

6. मार्जार योनि: ज्योतिष शास्त्र के अनुसार मार्जार यानि में जन्म लेने वाला जातक बहुत ही बहादुर और हिम्मत वाला होता है। ये निडर होते हैं और किसी भी हाल में डरते नहीं हैं। इनका स्वभाव बहुत अच्छा नहीं रहता है ये लोगों के प्रति दुष्टता का भाव रखते हैं। ये सभी प्रकार के कार्य करने में सक्षम होते हैं तथा मिठाईयों के शौकीन होते हैं।

7. मेष योनि: जिनका जन्म मेष योनि में होता है वे युद्ध के मैदान में अपने पराक्रम को दिखाते हैं। ये पराक्रमी और महान योद्धा होते हैं। इनमें उत्साह भरा होता है, ये धन-दौलत से परिपूर्ण ऐश्वर्यशाली, भोगी तथा दूसरों पर उपकार करने वाला होता है। इस योनि का जातक मेहनती होता है।

8. मूषक योनि: जिन व्यक्तियों का जन्म मूषक योनि मे होता है वे काफी बुद्धिमान और चतुर होते हैं। ये अपने काम में तत्पर और सजग रहते है। ये जो भी कदम उठाते हैं उसमें काफी सोच विचार कर और समझदारी से आगे बढ़ते हैं। ये आसानी से किसी पर विश्वास नहीं करते, और सदैव सचेत रहते हैं इनके पास काफी धन होता है।

9. सिंह योनि: इस योनि में जन्म लेने वाला जातक धर्म का आचरण करने वाला धर्मात्मा होता है। इनमें स्वाभिमान भरा होता है। ये गुणवान होते हें। इनका आचरण व व्यवहार नेक और सरल होता है। ये अपने निश्चय यानी इरादों के पक्के होते हैं। इनमें साहस और हिम्मत कूट-कूट कर भरा होता है। ये अपने कुटुम्ब एवं परिवार वालों का पूरा-पूरा ख्याल रखते हैं।

10. महिष योनि: महिष यानी भैंस योनि में जन्म लेने वाले व्यक्ति कुछ मंद बुद्धि के अर्थात कम बुद्धि वाले होते है। मार पीट एवं युद्ध में इन्हें सफलता मिलती है ये काम के प्रति बहुत अधिक उत्साही होते हैं। इन्हें कई संतानों का ख्याल रखना पड़ता है अर्थात इनके कई बच्चे होते हें। इन् वात रोग का सामना करना होताह है।

11. व्याघ्र योनि : व्याघ्र योनि में जन्म लेने वाला व्यक्ति सभी प्रकार के काम में कुशल होता है। ये किसी के अधीन रह कर काम करना पसंद नहीं करते हैं, ये स्वतंत्र रूप से काम करके धन अर्जन करने वाले होते हैं। इस योनि के जातक अपने मुंह मियां मिट्ठू होते हैं यानी अपनी तारीफ अपने मुंह से करने वाले होते हैं। ये अपने आपको बढ़ा चढ़ा कर बताने वाले होते हैं।

12. मृग योनि: ज्योतिषशास्त्र के नियमानुसार जो व्यक्ति मृग योनि में जन्म लेते हैं वे कोमल हृदय के व्यक्ति होते हैं। इनका व्यवहार नम्र और प्रेमपूर्ण होता है। ये शान्त मन के व्यक्ति होते हैं। सच्चे विचारों के और सत्य बोलने वाले होते हैं। ये धर्म कर्म मे आस्था रखने वाले होते हैं। ये अपने भाई बंधुओं से प्रेम करते हैं। ये स्वतंत्र विचारों के होते हैं और लड़ाई-झगड़े दूर रहने वाले होते हैं।

13. वानर योनि:  जिस व्यक्ति का जन्म वानर योनि में होता है वह चंचल स्वभाव का होता हैचंचल। ये बात बात पर लड़ाई करने हेतु तत्पर हो जाते हैं। ये काफी बहादुर और हिम्मत वाले होते हैं। इनमें काम के प्रति काफी उत्तेजना रहती है। इन्हें मीठा काफी पसंद होता है। ये अधिक से अधिक धन प्राप्त करने की चाहत रखते हैं। इनका घर संतान की किलकारियों से गूंजता रहता है।

14. नकुल योनि: जिन व्यक्तियों का जन्म नकुल योनि में होता है वे हर काम में पारंगत होते हैं। ये किसी भी काम को कुशलता पूर्वक करने में सक्षम होते हैं। परोपकार में ये तन, मन, धन से जुटे रहते हैं। ये विद्या के धनी विद्वान होते हैं तथा माता पिता की सेवा एवं भक्ति हृदय से करते हैं।

मौली और तिलक क्यों लगाते है

किसी भी शुभ कार्य से पहले या कोई भी पूजा करने से पहले तिलक किया जाता है और हाथों पर रक्षा सूत्र बांधते हैं फिर पूजा शुरू की जाती है। लेकिन क्या आप जानते हैं, ये रक्षा सूत्र क्यों बाधी जाती है। गौरतलब है कि कलावा बांधने की परंपरा तब से चली आ रही है, जब से महान, दानवीरों में अग्रणी महाराज बलि की अमरता के लिए वामन भगवान ने उनकी कलाई पर रक्षा सूत्र बांधा था। इसे रक्षा कवच के रूप में भी शरीर पर बांधा जाता है।
बताया जाता है कि इंद्र जब वृत्रासुर से युद्ध करने जा रहे थे तब इंद्राणी शची ने इंद्र की दाहिनी भुजा पर रक्षा-कवच के रूप में कलावा बांध दिया था और इंद्र इस युद्ध में विजयी हुए। उसके बाद से ये रक्षा सूत्र बांधा जाता है। वहीं इसके अनुष्ठान की बाधांए दूर हो जाती है। शास्त्रों का ऐसा मत है कि कलावा बांधने से त्रिदेव, ब्रह्मा, विष्णु व महेश तथा तीनों देवियों लक्ष्मी, पार्वती व सरस्वती की कृपा प्राप्त होती है। ब्रह्मा की कृपा से कीर्ति विष्णु की अनुकंपा से रक्षा बल मिलता है और शिव दुर्गुणों का विनाश करते हैं।
इसी प्रकार लक्ष्मी से धन, दुर्गा से शक्ति एवं सरस्वती की कृपा से बुद्धि प्राप्त होती है। वहीं अगर वैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो स्वास्थ्य के अनुसार रक्षा सूत्र बांधने से कई बीमारियां दूर होती है, जिसमें कफ, पित्त आदि शामिल है। शरीर की संरचना का प्रमुख नियंत्रण हाथ की कलाई में होता है, अतः यहां रक्षा सूत्र बांधने से व्यक्ति स्वस्थ रहता है। ऐसी भी मान्यता है कि इसे बांधने से बीमारी अधिक नहीं बढती है। ब्लड प्रेशर, हार्ट एटेक, डायबीटिज और लकवा जैसे रोगों से बचाव के लिये मौली बांधना हितकर बताया गया है।
मौली यानी रक्षा सूत्र शत प्रतिशत कच्चे धागे ,सूत, की ही होनी चाहिए। मौली बांधने की प्रथा तब से चली आ रही है जब दानवीर राजा बलि के लिए वामन भगवान ने उनकी कलाई पर रक्षा सूत्र बांधा था।
रक्षा सूत्र कब और कैसे धारण करे:
पुरुषों और अविवाहित कन्याओं के दाएं हाथ में और विवाहित महिलाओं के बाएं हाथ में रक्षा सूत्र बांधी जाती है। जिस हाथ में कलावा या मौली बांधें उसकी मुट्ठी बंधी हो एवं दूसरा हाथ सिर पर हो। इस पुण्य कार्य के लिए व्रतशील बनकर उत्तरदायित्व स्वीकार करने का भाव रखा जाए। पूजा करते समय नवीन वस्त्रों के न धारण किए होने पर मौली हाथ में धारण अवश्य करना चाहिए। धर्म के प्रति आस्था रखें। मंगलवार या शनिवार को पुरानी मौली उतारकर नई मोली धारण करें, संकटों के समय भी रक्षासूत्र हमारी रक्षा करते हैं।
व्यापार और घर में मौली का प्रयोग:
वाहन, कलम, बही खाते, फैक्ट्री के मेन गेट, चाबी के छल्ले, तिजोरी पर पवित्र मौली बांधने से लाभ होता है, महिलाये मटकी, कलश, कंडा, अलमारी, चाबी के छल्ले, पूजा घर में मौली बांधें या रखें मोली से बनी सजावट की वस्तुएं घर में रखेंगी तो नई खुशियां आती है। नौकरी पेशा लोग कार्य करने की टेबल एवं दराज में पवित्र मौली रखें या हाथ में मौली बांधेंगे तो लाभ प्राप्ति की संभावना बढ़ती है। मौली बांधते वक्त इस मंत्र का उच्चारण किया जाता है- येन बद्धो बलीराजा दावेंद्रो महाबलः !
तेन त्वामनुबध्नामि रक्षे माचल माचल !!
आपने अक्सर देखा होगा कि घरों और मंदिरों में पूजा के बाद पंडित जी हमारी कलाई पर लाल रंग का कलावा या मौली बांधते हैं और, हम में से बहुत से लोग बिना इसकी जरुरत को पहचाते हुए इसे हाथों में बंधवा लेते हैं।
दरअसल मौली का धागा कोई ऐसा-वैसा धागा नहीं होता है बल्कि, यह कच्चे सूत से तैयार किया जाता है और, यह कई रंगों जैसे, लाल,काला, पीला अथवा केसरिया रंगों में होती है।मौली को लोग साधारणतया लोग हाथ की कलाई में बांधते हैं.! और, ऐसा माना जाता है कि हाथ में मौली का बांधने से मनुष्य को भगवान ब्रह्मा, विष्णु व महेश तथा तीनों देवियों- लक्ष्मी, पार्वती एवं सरस्वती की कृपा प्राप्त होती है।
कहा जाता है कि हाथ में मौली धागा बांधने से मनुष्य बुरी दृष्टि से बचा रहता है क्योंकि भगवान उसकी रक्षा करते हैं ! और, इसीलिए कहा जाता है क्योंकि हाथों में मौली धागा बांधने से मनुष्य के स्वास्थ्य में बरकत होती है कारण कि, इस धागे को कलाई पर बांधने से शरीर में वात,पित्त तथा कफ के दोष में सामंजस्य बैठता है।तथा, ये सामंजस्य इसीलिए हो पाता हैं क्योंकि शरीर की संरचना का प्रमुख नियंत्रण हाथ की कलाई में होता है आपने देखा होगा कि डॉक्टर रक्तचाप एवं ह्रदय गति मापने के लिए कलाई के नस का उपयोग प्राथमिकता से करते हैं . इसीलिए वैज्ञानिकता के तहत हाथ में बंधा हुआ मौली धागा एक एक्यूप्रेशर की तरह काम करते हुए मनुष्य कोर क्तचाप, हृदय रोग, मधुमेह और लकवा जैसे गंभीर रोगों से काफी हद तक बचाता है एवं, इसे बांधने वाला व्यक्ति स्वस्थ रहता ह।

Tuesday, 4 October 2016

॥ देवीसूक्तम् ॥

॥ देवीसूक्तम् ॥

श्रीगणेशाय नमः ।
नमो देव्यै महादेव्यै शिवायै सततं नमः ।
नमः प्रकृत्यै भद्रायै नियताः प्रणताः स्म ताम् ॥ १॥

रौद्रायै नमो नित्यायै गौर्यै धात्र्यै नमो नमः ।
ज्योत्स्नायै चेन्दुरूपिण्यै सुखायै सततं नमः ॥ २॥

कल्याण्यै प्रणतां वृद्ध्यै सिद्ध्यै कुर्मो नमो नमः ।
नैऋर्त्यै भूभृतां लक्ष्म्यै शर्वाण्यै ते नमो नमः ॥ ३॥

दुर्गायै दुर्गपारायै सारायै सर्वकारिण्यै ।
ख्यात्यै तथैव कृष्णायै धूम्रायै सततं नमः ॥ ४॥

अतिसौम्यातिरौद्रायै नतास्तस्यै नमो नमः ।
नमो जगत्प्रतिष्ठायै देव्यै कृत्यै नमो नमः ॥ ५॥

या देवी सर्वभूतेषु विष्णुमायेति शब्दिता ।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥ ६॥

या देवी सर्वभूतेषु चेतनेत्यभिधीयते ।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥ ७॥

या देवी सर्वभूतेषु बुद्धिरूपेण संस्थिता ।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥ ८॥

या देवी सर्वभूतेषु निद्रारूपेण संस्थिता ।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥ ९॥

या देवी सर्वभूतेषु क्षुधारूपेण संस्थिता ।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥ १०॥

या देवी सर्वभूतेषु छायारूपेण संस्थिता ।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥ ११॥

या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता ।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥ १२॥

या देवी सर्वभूतेषु तृष्णारूपेण संस्थिता ।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥ १३॥

या देवी सर्वभूतेषु क्षान्तिरूपेण संस्थिता ।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥ १४॥

या देवी सर्वभूतेषु जातिरूपेण संस्थिता ।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥ १५॥

या देवी सर्वभूतेषु लज्जारूपेण संस्थिता ।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥ १६॥

या देवी सर्वभूतेषु शान्तिरूपेण संस्थिता ।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥ १७॥

या देवी सर्वभूतेषु श्रद्धारूपेण संस्थिता ।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥ १८॥

या देवी सर्वभूतेषु कान्तिरूपेण संस्थिता ।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥ १९॥

या देवी सर्वभूतेषु लक्ष्मीरूपेण संस्थिता ।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥ २०॥

या देवी सर्वभूतेषु वृत्तिरूपेण संस्थिता ।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥ २१॥

या देवी सर्वभूतेषु स्मृतिरूपेण संस्थिता ।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥ २२॥

या देवी सर्वभूतेषु दयारूपेण संस्थिता ।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥ २३॥

या देवी सर्वभूतेषु तुष्टिरूपेण संस्थिता ।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥ २४॥

या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थिता ।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥ २५॥

या देवी सर्वभूतेषु भ्रान्तिरूपेण संस्थिता ।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥ २६॥

इन्द्रियाणामधिष्ठात्री भूतानां चाखिलेषु या ।
भूतेषु सततं तस्यै व्याप्त्यै दैव्यै नमो नमः ॥ २७॥

चित्तिरूपेण या कृत्स्नमेतद्व्याप्य स्थितां जगत् ।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥ २८॥

स्तुता सुरैः पूर्वमभीष्टसंश्रयात्तथा सुरेन्द्रेण दिनेषु सेविता ॥

करोतु सा नः शुभहेतुरीश्वरी शुभानि भद्राण्यभिहन्तु चापदः ॥ २९॥

या साम्प्रतं चोद्धतदैत्यतापितैरस्माभिरीशा च सुरैर्नमस्यते ।
या च स्मृता तत्क्षणमेव हन्ति नः सर्वापदो
भक्तिविनम्रमूर्तिभिः ॥ ३०॥

प्रॉपर्टी और वाहन के लिये

प्रोपर्टी और वाहन का सुख पाने के किए नवरात्रे भर किसी गरीब बूढी महिला या नेत्रहीन को भोजन करायें, और वस्त्र इत्यादि दान में दें |  कन्याओं को दूध , केसर और सुंगध से बनी चीज खिलाएं |

संतान प्रप्ति के लिये नवरात्रि मे करे

शाम को फलाहार लेने से पहले प्रतिदिन एक छोटी बच्ची (2-9 साल) को अपने घर बुलाकर उनको माँ भगवती का स्वरुप मान कर उनको भोजन कराएं। बच्ची को प्रतिदिन कोई गिफ्ट जरूर दें। चरण स्पर्श कर संतान प्राप्ति की मन ही मन प्रार्थना करें।
पांचवे दिन माँ स्कंदमाता से संतान प्राप्ति की मनोकामना की जाती है। अत: कन्या को पांच प्रकार की श्रृंगार सामग्री देना अत्यंत शुभ होता है। इनमें बिंदिया, चूड़ी, मेहंदी, बालों के लिए क्लिप्स, सुगंधित साबुन, काजल, नेलपॉलिश, टैल्कम पावडर इत्यादि हो सकते हैं।

Saturday, 1 October 2016

Nav durga strort

🍁॥ नवदुर्गास्तोत्रम्॥🍁

👉देवी शैलपुत्री ।
     वन्दे वाञ्छितलाभाय चन्द्रार्धकृतशेखरा।म्
     वृषारूढां शूलधरां शैलपुत्री यशस्विनीम् ॥

👉देवी ब्रह्मचारिणी ।
     दधाना करपद्माभ्यामक्षमाला कमण्डलूम् ।
     देवी प्रसीदतु मयि ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा ॥

👉देवी चन्द्रघण्टेति ।
     पिण्डजप्रवरारूढा चन्दकोपास्त्रकैर्युता ।
     प्रसादं तनुते मह्यं चन्द्रघण्टेति विश्रुता ॥

👉देवी कूष्मांडा ।
     सुरासम्पूर्णकलशं रुधिराप्लुतमेव च ।
     दधाना हस्तपद्माभ्यां कूष्माण्डा शुभदास्तु मे ॥

👉देवीस्कन्दमाता ।
     सिंहासनगता नित्यं पद्माश्रितकरद्वया ।
     शुभदास्तु सदा देवी स्कन्दमाता यशस्विनी ॥

👉देवीकात्यायनी ।
     चन्द्रहासोज्ज्वलकरा शार्दूलवरवाहना ।
     कात्यायनी शुभं दद्यादेवी दानवघातिनी ॥

👉देवीकालरात्रि ।
     एकवेणी जपाकर्णपूर नग्ना खरास्थिता ।
     लम्बोष्ठी कर्णिकाकर्णी तैलाभ्यक्तशरीरिणी ॥
     वामपादोल्लसल्लोहलताकण्टकभूषणा ।
     वर्धनमूर्ध्वजा कृष्णा कालरात्रिर्भयङ्करी ॥

👉देवीमहागौरी ।
     श्वेते वृषे समारूढा श्वेताम्बरधरा शुचिः ।
     महागौरी शुभं दद्यान्महादेवप्रमोददा ॥

👉देवीसिद्धिदात्रि ।
     सिद्धगन्धर्वयक्षाद्यैरसुरैरमरैरपि ।
     सेव्यमाना सदा भूयात् सिद्धिदा सिद्धिदायिनी ॥                 

         ✍ आप  को    नवरात्री   की   सुभकामना
*जयमाताजी*

अथ सिद्धकुञ्जिकास्तोत्रम् ।। Siddha kunjika Stotram.

शृणु देवि प्रवक्ष्यामि कुञ्जिकास्तोत्रमुत्तमम् ।
येन मन्त्रप्रभावेण चण्डीजापः शुभो भवेत् ॥ १॥

न कवचं नार्गलास्तोत्रं कीलकं न रहस्यकम् ।
न सूक्‍तं नापि ध्यानं च न न्यासो न च वार्चनम् ॥ २॥

कुञ्जिकापाठमात्रेण दुर्गापाठफलं लभेत् ।
अति गुह्यतरं देवि देवानामपि दुर्लभम् ॥ ३॥

गोपनीयं प्रयत्नेन स्वयोनिरिव पार्वति ।
मारणं मोहनं वश्यं स्तम्भनोच्चाटनादिकम् ।
पाठमात्रेण संसिद्ध्येत् कुञ्जिकास्तोत्रमुत्तमम् ॥ ४॥

।। अथ मन्त्रः ।।
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ।
ॐ ग्लौं हुं क्लीं जूं सः ज्वालय ज्वालय ज्वल ज्वल प्रज्वल प्रज्वल
ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ज्वल हं सं लं क्षं फट् स्वाहा ॥ ५॥

।। इति मन्त्रः ।।

नमस्ते रुद्ररूपिण्यै नमस्ते मधुमर्दिनि ।
नमः कैटभहारिण्यै नमस्ते महिषार्दिनि ॥ ६॥

नमस्ते शुम्भहन्त्र्यै च निशुम्भासुरघातिनि ।
जाग्रतं हि महादेवि जपं सिद्धं कुरूष्व मे ॥ ७॥

ऐङ्कारी सृष्टिरूपायै ह्रीङ्कारी प्रतिपालिका ।
क्लीङ्कारी कामरूपिण्यै बीजरूपे नमोऽस्तु ते ॥ ८॥

चामुण्डा चण्डघाती च यैकारी वरदायिनी ।
विच्चे चाभयदा नित्यं नमस्ते मन्त्ररूपिणि ॥ ९॥

धां धीं धूं धूर्जटेः पत्नी वां वीं वूं वागधीश्वरी ।
क्रां क्रीं क्रूं कालिका देवि शां शीं शूं मे शुभं कुरु ॥ १०॥

हुं हुं हुङ्काररूपिण्यै जं जं जं जम्भनादिनी ।
भ्रां भ्रीं भ्रूं भैरवी भद्रे भवान्यै ते नमो नमः ॥ ११॥

अं कं चं टं तं पं यं शं वीं दुं ऐं वीं हं क्षं ।
धिजाग्रम् धिजाग्रं त्रोटय त्रोटय दीप्तं कुरु कुरु स्वाहा ॥ १२॥

पां पीं पूं पार्वती पूर्णा खां खीं खूं खेचरी तथा ।
सां सीं सूं सप्तशती देव्या मन्त्रसिद्धिं कुरूष्व मे ॥ १३॥

इदं तु कुञ्जिकास्तोत्रं मन्त्रजागर्तिहेतवे ।
अभक्‍ते नैव दातव्यं गोपितं रक्ष पार्वति ॥ १४॥

यस्तु कुञ्जिकया देवि हीनां सप्तशतीं पठेत् ।
न तस्य जायते सिद्धिररण्ये रोदनं यथा ॥ १५॥

।। इति श्रीरुद्रयामले गौरीतन्त्रे शिवपार्वतीसंवादे कुञ्जिकास्तोत्रं सम्पूर्णम् ।।