Thursday, 16 February 2017

आखिर क्यों चढ़ाया जाता है भगवान शिव को कच्चा दूध और कृष्ण को माखन

*🍀आखिर क्यों चढ़ाया जाता है भगवान शिव को कच्चा दूध और कृष्ण को माखन !🍀*

🌷हिन्दू धर्म  में हमने देखा की देवी देवताओ कोप्रसाद या कोई चढ़ावे के रूप वे चीजे दी जाती है जो उन्हें प्रिय होती है जैसे हम बजरंग बली को सिंदूर, नवरात्रों में माँ दुर्गा को लाल चुनरी औरभगवान गणेश को मोदक चढ़ाते है. लेकिन क्या आपको पता है की भगवान कृष्ण और शिव दोनों को दूध पसंद है पर दूध की अवस्था अलग-अलग है.

🌷जहाँ भगवान शिव को दूध की प्रथम अवस्था यानि की कच्चा दूध पसंद है वहीं भगवान श्री कृष्ण को दूध की अंतिम अवस्था माखन पसंद है. जिस तरह संसार में हर चीज का कारण होता है उसी प्रकार कथाओ और मान्यताओ का भी एक आधार होता है जिसे अगर सही दिशा में सोचा जाए तो पुराणों मे छुपी कई कहानियों के तथ्य मिलते हैं.

🌷भगवान शिव को कच्चा दूध चढ़ाने के पीछे ये तथ्य है कि भगवान शिव को किसी भी जीव या वस्तु की प्राकृतिक अवस्था प्रिय है. जैसे कच्चादूध, दूध की प्रथम अवस्था है. इसका मानवीकरण करें तो जिस प्रकार शिशु जन्म लेता है उसे सांसरिक बन्धनों या माया से कुछ लेना-देना नहीं होता यानि वो प्रकृति के सबसे समीप रहता है. इसी तरह बिना किसी मिलावट और नकरात्मक तत्व रहित कच्चा दूध शिव को प्रिय है.

🌷इसी प्रकार श्रीकृष्ण को मक्खन प्रिय है  जो कि दूध की अंतिम अवस्था है. जिस प्रकार मनुष्य जन्म के बाद से जीवन के कई पड़ावों से गुजरते हुए, कई अनुभवों को लेकर अपने जीवन की चरम अवस्था तक पहुंचता है. यानि वो अंत में सभी प्रकार की मोह-माया और बंधनों से मुक्त होकर मक्खन या माखन जैसी शुद्ध अवस्था तक पहुंचता है. इसलिए श्रीकृष्ण को संसार में रहते हुए भी उसके मोह में न पड़ने वाले मनुष्य बहुत प्रिय होते है !
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Tuesday, 31 January 2017

वसंत पंचमी पर करे ये उपाय

वसंत पंचमी

सरस्वती जी का वैदिक अष्टाक्षर मूल मंत्र जिसे भगवान शिव ने कणादमुनि तथा गौतम को, श्रीनारायण ने वाल्मीकि को, ब्रह्मा जी ने भृगु को, भृगुमुनि ने शुक्राचार्य को, कश्यप ने बृहस्पति को दिया था जिसको सिद्ध करने से मनुष्य बृहस्पति के समान हो जाता है 


“श्रीं ह्रीं सरस्वत्यै स्वाहा”

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आज के दिन क्या करें :
आज के दिन बच्चे/जवान/बूढ़े सभी लोग पीले/सफ़ेद रंग के वस्त्र पहने।
आज माँ शारदा को पीले चावल (ताहरी), पीले लड्डू व केसर युक्त खीर का भोग लगाएं और घर के सभी लोग खाएं।
बच्चों को आज से 11 तुलसी के पत्तों का रस मिश्री के साथ देना शुरू करें। स्मरण शक्ति में वृद्धि होगी।
अगर आपके बच्चे को वाणी दोष है अर्थात बोलने/हकलाने/लड़खड़ाकर बोलने की समस्या है तो बच्चे की जीभ पर केसर से चांदी की सलाई द्वारा ‘ऐं’ बीज मंत्र लिखें। 

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बसंत पंचमी के दिन वास्तु उपाय:
बच्चाा जिस तरफ मुंह करके पढता हो, उस दीवार पर आज के दिन मां सरस्वती का चित्र लगाएं। पढाई में रूचि जागृत होगी। कोशिश करें पढ़ते समय बच्चे का मुहँ उत्तर, पूर्व अथवा उत्तर-पूर्व में रहे।
सोते समय बच्चों को सिर पूर्व की ओर रखना चाहिए। इससे स्मरण-शक्ति बढ़ती है।
जो बच्चे पढ़ते समय शीघ्र सोने लगते हैं अथवा मन भटकने के कारण अध्ययन नहीं कर पाते, उनके अध्ययन कक्ष में आज ही हरे रंग के परदे लगाएं।
एक क्रिस्टल बॉल अथवा क्रिस्टल का श्रीयंत्र लाकर अपने अध्ययन कक्ष में रख लें। यह नकारात्मक ऊर्जा को सोख लेता है।

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वसंत पंचमी

वसंत पंचमी

वसंत पंचमी
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बसंत पंचमी को सभी शुभ कार्यों के लिए अत्यंत शुभ मुहूर्त माना गया है। मुख्यतः विद्यारंभ, नवीन विद्या प्राप्ति एवं गृह प्रवेश के लिए बसंत पंचमी को पुराणों में भी अत्यंत श्रेयस्कर माना गया है। बसंत पंचमी को अत्यंत शुभ मुहूर्त मानने के पीछे अनेक कारण हैं। यह पर्व अधिकतर माघ मास में ही पड़ता है। माघ मास का भी धार्मिक एवं आध्यात्मिक दृष्टि से विशेष महत्व है। इस माह में पवित्र तीर्थों में स्नान करने का विशेष महत्व बताया गया है। दूसरे इससमय सूर्यदेव भी उत्तरायण होते हैं।
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ज्योतिषीय दृष्टि से सूर्य को ब्रह्माण्ड की आत्मा, पद, प्रतिष्ठा, भौतिक समृद्धि, औषधि तथा ज्ञान और बुद्धि का कारक ग्रह माना गया है। इसी प्रकार पंचमी तिथि किसी न किसी देवता को समर्पित है। बसंत पंचमी को मुख्यतः सरस्वती पूजन के निमित्त ही माना गया है। इस ऋतु में प्रकृति को ईश्वर प्रदत्त वरदान खेतों में हरियाली एवं पौधों एवं वृक्षों पर पल्लवित पुष्पों एवं फलों के रूप में स्पष्ट देखा जा सकता है।

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बसंत पंचमी के दिन सरस्वती पूजन और व्रत करने से वाणी मधुर होती है, स्मरण शक्ति तीव्र होती है, प्राणियों को सौभाग्य प्राप्त होता है, विद्या में कुशलता प्राप्त होती है। पति-पत्नी और बंधुजनों का कभी वियोग नहीं होता है तथा दीर्घायु एवं निरोगता प्राप्त होती है। इस दिन भक्तिपूर्वक ब्राह्मण के द्वारा स्वस्ति वाचन कराकर गंध, अक्षत, श्वेत पुष्प माला, श्वेत वस्त्रादि उपचारों से वीणा, अक्षमाला, कमण्डल, तथा पुस्तक धारण की हुई सभी अलंकारों से अलंकृत भगवती गायत्री का पूजन करें। फिर इस प्रकार हाथ जोड़कर मंत्रोच्चार करें-

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"यथा वु देवि भगवान ब्रह्मा लोकपितामहः।
त्वां परित्यज्य नो तिष्ठंन, तथा भव वरप्रदा।।
वेद शास्त्राणि सर्वाणि नृत्य गीतादिकं चरेत्।
वादितं यत् त्वया देवि तथा मे सन्तुसिद्धयः।।
लक्ष्मीर्वेदवरा रिष्टिर्गौरी तुष्टिः प्रभामतिः।
एताभिः परिहत्तनुरिष्टाभिर्मा सरस्वति।।

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पूजा कक्ष को अच्छी तरह साफ़ किया जाता है, तथा सरस्वती देवी की प्रतिमा को पीले फूलों से सजे लकड़ी के मंडप पर रखा जाता है। मूर्ति को भी पीत पुष्पों से सजाया जाता है। एवं पीत परिधान पहनाये जाते हैं। पीला रंग हिन्दुओं का शुभ रंग है। इसी प्रतिमा के निकट गणेश का चित्र या प्रतिमा भी स्थापित की जाती है। परिवार के सभी सदस्य तथा पूजा में सम्मिलित होने वाले सभी व्यक्ति भी पीले वस्त्र धारण करते हैं। बच्चे वयस्क देवी को प्रणाम करते हैं। बेर व संगरी प्रसाद की मुख्य वस्तुएँ हैं तथा इन्हीं के साथ पीली बर्फी या बेसन लड्डू भी रखे जाते हैं।
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Monday, 30 January 2017

जनेऊ क्या है और इसकी क्या महत्वता हे ?

जनेऊ क्या है और इसकी क्या महत्वता हे ?

जनेऊ क्या है :
आपने देखा होगा कि बहुत से लोग बाएं कांधे से दाएं बाजू की ओर एक कच्चा धागा लपेटे रहते हैं। इस धागे को जनेऊ कहते हैं। जनेऊ तीन धागों वाला एक सूत्र होता है। जनेऊ को संस्कृत भाषा में ‘यज्ञोपवीत’ कहा जाता है। यह सूत से बना पवित्र धागा होता है, जिसे व्यक्ति बाएं कंधे के ऊपर तथा दाईं भुजा के नीचे पहनता है। अर्थात इसे गले में इस तरह डाला जाता है कि वह बाएं कंधे के ऊपर रहे।

तीन सूत्र क्यों :
जनेऊ में मुख्‍यरूप से तीन धागे होते हैं। यह तीन सूत्र देवऋण, पितृऋण और ऋषिऋण के प्रतीक होते हैं और  यह सत्व, रज और तम का प्रतीक है। यह गायत्री मंत्र के तीन चरणों का प्रतीक है।यह तीन आश्रमों का प्रतीक है। संन्यास आश्रम में यज्ञोपवीत को उतार दिया जाता है।

नौ तार :
यज्ञोपवीत के एक-एक तार में तीन-तीन तार होते हैं। इस तरह कुल तारों की संख्‍या नौ होती है। एक मुख, दो नासिका, दो आंख, दो कान, मल और मूत्र के दो द्वारा मिलाकर कुल नौ होते हैं।

पांच गांठ :
यज्ञोपवीत में पांच गांठ लगाई जाती है जो ब्रह्म, धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का प्रतीक है। यह पांच यज्ञों, पांच ज्ञानेद्रियों और पंच कर्मों का भी प्रतीक भी है

वैदिक धर्म में प्रत्येक  आर्य का कर्तव्य है जनेऊ पहनना और उसके नियमों का पालन करना। प्रत्येक  आर्य (हिन्दू) जनेऊ पहन सकता है बशर्ते कि वह उसके नियमों का पालन करे।

ब्राह्मण ही नहीं समाज का हर वर्ग जनेऊ धारण कर सकता है। जनेऊ धारण करने के बाद ही द्विज बालक को यज्ञ तथा स्वाध्याय करने का अधिकार प्राप्त होता है। द्विज का अर्थ होता है दूसरा जन्म। लडकियों  को भी  जनेऊ धारण करने  का  अधिकार है ।

जनेऊ की लंबाई :
यज्ञोपवीत की लंबाई 96 अंगुल होती है। इसका अभिप्राय यह है कि जनेऊ धारण करने वाले को 64 कलाओं और 32 विद्याओं को सीखने का प्रयास करना चाहिए। चार वेद, चार उपवेद, छह अंग, छह दर्शन, तीन सूत्रग्रंथ, नौ अरण्यक मिलाकर कुल 32 विद्याएं होती है। 64 कलाओं में जैसे- वास्तु निर्माण, व्यंजन कला, चित्रकारी, साहित्य कला, दस्तकारी, भाषा, यंत्र निर्माण, सिलाई, कढ़ाई, बुनाई, दस्तकारी, आभूषण निर्माण, कृषि ज्ञान आदि।

जनेऊ के नियम :

1.
यज्ञोपवीत को मल-मूत्र विसर्जन के पूर्व दाहिने कान पर चढ़ा लेना चाहिए और हाथ स्वच्छ करके ही उतारना चाहिए। इसका स्थूल भाव यह है कि यज्ञोपवीत कमर से ऊंचा हो जाए और अपवित्र न हो। अपने व्रतशीलता के संकल्प का ध्यान इसी बहाने बार-बार किया जाए।
2.
यज्ञोपवीत का कोई तार टूट जाए या 6 माह से अधिक समय हो जाए, तो बदल देना चाहिए। खंडित यज्ञोपवीत शरीर पर नहीं रखते। धागे कच्चे और गंदे होने लगें, तो पहले ही बदल देना उचित है।
3.
जन्म-मरण के सूतक के बाद इसे बदल देने की परम्परा है। महिलाओं  को हर मास मासिक धर्म के बाद जनेऊ  को बदल देना चाहिए ।
4.
यज्ञोपवीत शरीर से बाहर नहीं निकाला जाता। साफ करने के लिए उसे कण्ठ में पहने रहकर ही घुमाकर धो लेते हैं। भूल से उतर जाए, तो प्रायश्चित करें ।
5.
मर्यादा बनाये रखने के लिए उसमें चाबी के गुच्छे आदि न बांधें। इसके लिए भिन्न व्यवस्था रखें। बालक जब इन नियमों के पालन करने योग्य हो जाएं, तभी उनका यज्ञोपवीत करना चाहिए।

* चिकित्सा विज्ञान के अनुसार दाएं कान की नस अंडकोष और गुप्तेन्द्रियों से जुड़ी होती है। मूत्र विसर्जन के समय दाएं कान पर जनेऊ लपेटने से शुक्राणुओं की रक्षा होती है।💐

* वैज्ञानिकों अनुसार बार-बार बुरे स्वप्न आने की स्थिति में जनेऊ धारण करने से इस समस्या से मुक्ति मिल जाती है।

* कान में जनेऊ लपेटने से मनुष्य में सूर्य नाड़ी का जाग्रण होता है।🍀

* कान पर जनेऊ लपेटने से पेट संबंधी रोग एवं रक्तचाप की समस्या से भी बचाव होता है।

* माना जाता है कि शरीर के पृष्ठभाग में पीठ पर जाने वाली एक प्राकृतिक रेखा है जो विद्युत प्रवाह की तरह काम करती है। यह रेखा दाएं कंधे से लेकर कमर तक स्थित है। जनेऊ धारण करने से विद्युत प्रवाह नियंत्रित रहता है जिससे काम-क्रोध पर नियंत्रण रखने में आसानी होती है।🙏

* जनेऊ से पवित्रता का अहसास होता है। यह मन को बुरे कार्यों से बचाती है। कंधे पर जनेऊ है, इसका मात्र अहसास होने से ही मनुष्य भ्रष्टाचार से दूर रहने लगता है। 🚩!

Thursday, 19 January 2017

महिलाओं के पांव की छन-छन ऐसे असर डालती है लॉकर पर, ये हैं इसके लाभ

महिलाओं के पांव की छन-छन ऐसे असर डालती है लॉकर पर, ये हैं इसके लाभ
शास्त्रों के अनुसार जो महिलाएं प्रतिदिन सुबह सोलह श्रृंगार करती हैं, उनके घर में देवी महालक्ष्मी का वास होता है। उनका परिवार खुशहाल रहता है। महिलाओं के सोलह श्रृंगार की खास वस्तु पायल, जो उनके पैरों की खूबसूरती तो बढ़ाती ही है साथ में अन्य लाभ भी देती है। चांदी से निर्मित पायल को पांव में डाला जाता है। यह चंद्रमा की धातु होती है, जो मन का कारक ग्रह है। इसमें बजने वाले घुंघरू मन को एकाग्र करके रखते हैं, भटकने नहीं देते। जिस घर में महिलाओं के पांव की छन-छन होती है, वहां दैवीय शक्तियां अपनी कृपा बरसाती हैं और सकारात्मक माहौल बना रहता है।

* चांदी जब शरीर के साथ लगी रहती है तो हडिड्यों को मजबूती मिलती है।

* अकसर देखा जाता है की जब बेटी घर से विदा होती है तो लक्ष्मी भी अपना मुंह मोड़ लेती है। आर्थिक संकट से बचने के लिए बेटी का जब रिश्ता पक्का हो, उसे पायल पहना दें। विदाई के समय एक पायल बेटी के पांव से निकलवा कर अपने लॉकर में रख लें  और दूसरी पायल उसे दे दें, वो अपने लॉकर में रख ले।

* दाएं पैर की पायल गुमने से सामाज में बदनामी सहनी पड़ती है।


* बाएं पैर की पायल गुमना एक्सीडैंट अथवा महाविपदा का संकेत है।

कौन सी धातु के बर्तन में भोजन करने से क्या क्या लाभ और हानि होती है

कौन सी धातु के बर्तन में भोजन करने से क्या क्या लाभ और हानि होती है
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सोना
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सोना एक गर्म धातु है। सोने से बने पात्र में भोजन बनाने और करने से शरीर के आन्तरिक और बाहरी दोनों हिस्से कठोर, बलवान, ताकतवर और मजबूत बनते है और साथ साथ सोना आँखों की रौशनी बढ़ता है।

चाँदी
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चाँदी एक ठंडी धातु है, जो शरीर को आंतरिक ठंडक पहुंचाती है। शरीर को शांत रखती है  इसके पात्र में भोजन बनाने और करने से दिमाग तेज होता है, आँखों स्वस्थ रहती है, आँखों की रौशनी बढती है और इसके अलावा पित्तदोष, कफ और वायुदोष को नियंत्रित रहता है।

कांसा
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काँसे के बर्तन में खाना खाने से बुद्धि तेज होती है, रक्त में  शुद्धता आती है, रक्तपित शांत रहता है और भूख बढ़ाती है। लेकिन काँसे के बर्तन में खट्टी चीजे नहीं परोसनी चाहिए खट्टी चीजे इस धातु से क्रिया करके विषैली हो जाती है जो नुकसान देती है। कांसे के बर्तन में खाना बनाने से केवल ३ प्रतिशत ही पोषक तत्व नष्ट होते हैं।

तांबा
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तांबे के बर्तन में रखा पानी पीने से व्यक्ति रोग मुक्त बनता है, रक्त शुद्ध होता है, स्मरण-शक्ति अच्छी होती है, लीवर संबंधी समस्या दूर होती है, तांबे का पानी शरीर के विषैले तत्वों को खत्म कर देता है इसलिए इस पात्र में रखा पानी स्वास्थ्य के लिए उत्तम होता है. तांबे के बर्तन में दूध नहीं पीना चाहिए इससे शरीर को नुकसान होता है।

पीतल
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पीतल के बर्तन में भोजन पकाने और करने से कृमि रोग, कफ और वायुदोष की बीमारी नहीं होती। पीतल के बर्तन में खाना बनाने से केवल ७ प्रतिशत पोषक तत्व नष्ट होते हैं।

लोहा
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लोहे के बर्तन में बने भोजन खाने से  शरीर  की  शक्ति बढती है, लोह्तत्व शरीर में जरूरी पोषक तत्वों को बढ़ता है। लोहा कई रोग को खत्म करता है, पांडू रोग मिटाता है, शरीर में सूजन और  पीलापन नहीं आने देता, कामला रोग को खत्म करता है, और पीलिया रोग को दूर रखता है. लेकिन लोहे के बर्तन में खाना नहीं खाना चाहिए क्योंकि इसमें खाना खाने से बुद्धि कम होती है और दिमाग का नाश होता है। लोहे के पात्र में दूध पीना अच्छा होता है।

स्टील
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स्टील के बर्तन नुक्सान दायक नहीं होते क्योंकि ये ना ही गर्म से क्रिया करते है और ना ही अम्ल से. इसलिए नुक्सान नहीं होता है. इसमें खाना बनाने और खाने से शरीर को कोई फायदा नहीं पहुँचता तो नुक्सान भी  नहीं पहुँचता।

एलुमिनियम
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एल्युमिनिय बोक्साईट का बना होता है। इसमें बने खाने से शरीर को सिर्फ नुक्सान होता है। यह आयरन और कैल्शियम को सोखता है इसलिए इससे बने पात्र का उपयोग नहीं करना चाहिए।
इससे हड्डियां कमजोर होती है. मानसिक बीमारियाँ होती है, लीवर और नर्वस सिस्टम को क्षति पहुंचती है। उसके साथ साथ किडनी फेल होना, टी बी, अस्थमा, दमा, बात रोग, शुगर जैसी गंभीर बीमारियाँ होती है। एलुमिनियम के प्रेशर कूकर से खाना बनाने से 87 प्रतिशत पोषक तत्व खत्म हो जाते हैं।

मिट्टी
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मिट्टी के बर्तनों में खाना पकाने से ऐसे पोषक तत्व मिलते हैं, जो हर बीमारी को शरीर से दूर रखते थे। इस बात को अब आधुनिक विज्ञान भी साबित कर चुका है कि मिट्टी के बर्तनों में खाना बनाने से शरीर के कई तरह के रोग ठीक होते हैं।

आयुर्वेद के अनुसार, अगर भोजन को पौष्टिक और स्वादिष्ट बनाना है तो उसे धीरे-धीरे ही पकना चाहिए। भले ही मिट्टी के बर्तनों में खाना बनने में वक़्त थोड़ा ज्यादा लगता है, लेकिन इससे सेहत को पूरा लाभ मिलता है। दूध और दूध से बने उत्पादों के लिए सबसे उपयुक्त है मिट्टी के बर्तन। मिट्टी के बर्तन में खाना बनाने से पूरे १०० प्रतिशत पोषक तत्व मिलते हैं। और यदि मिट्टी के बर्तन में खाना खाया जाए तो उसका अलग से स्वाद भी आता है।

अर्थात् पानी पीने के लिए ताँबा, स्फटिक अथवा काँच-पात्र का उपयोग करना चाहिए। सम्भव हो तो वैङूर्यरत्नजड़ित पात्र का उपयोग करें। इनके अभाव में मिट्टी के जलपात्र पवित्र व शीतल होते हैं। टूटे-फूटे बर्तन से अथवा अंजलि से पानी नहीं पीना चाहिए।

नित्य पूजा पाठ के नियम

नित्य पूजा पाठ के नियम
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कई बार लोग प्रश्न करते हैं कि घर में नियमित पूजा-पाठ किस तरह की जाये और किस भगवान की पूजा की जाये शुद्ध आसन पर बैठकर प्रातः और संध्या को पूजा अर्चना करने को नित्य नियम कहते हैं पाठ का क्रम इस तरह से होना चाहिए :-
1. सर्वप्रथम गणेश जी की उपासना:- विघ्नों को दूर करने के लिए
2 . सूर्य भगवान की उपासना:- स्वास्थ्य के लिए
3 . माँ भगवती की उपासना :- शक्ति के लिए
4 . भगवान शंकर की उपासना:- भक्ति के लिए और सभी प्रकार के शारीरिक और मानसिक कष्ट और विपदाओं से निवारण के लिये
5 . उसके बाद अपने कुल देवता, इष्ट देवता और पितृ देवताओं की उपासना करनी चाहिए
कुछ अनुभूत नित्य नियम
1. नारायण कवच या हनुमान चालीसा एक सर्वविदित और लोकप्रिय उपाय है इसके नित्य कम से कम तीन बार पाठ करने से हर तरह की बाधाओं का निवारण हो जाता है और अटके हुए काम बन जाते हैं
२. दरिद्रता के नाश के लिए माँ लक्ष्मी के श्रीसूक्त या लिंगाष्टक का पाठ करना चाहिए
३. रोग से मुक्ति पाने के लिए और ऋण से पाने के लिए गजेन्द्र मोक्ष और नवग्रह स्तुति नित्य नियम से करना चाहिए.
४. यदि कोई व्यक्ति प्राचीन मंदिर का जीर्णोद्धार कराता है तो उसे अनंत कोटि फल प्राप्त होते हैं
५. मंदिर में आरती के लिए धुप दीप की व्यवस्था करता है तो उसे यश कीर्ति की प्राप्ति होती है
६. अगर व्यक्ती गाय के लिए चारे पानी की व्यवस्था करता है, पक्षियों को चूगा डालता है तो उसके घर से सभी अमंगल दूर होते हैं.
७. जो लोग देवताओं को भोग लगाकर ब्राह्मणों और साधुओं को प्रसाद वितरण करते है उनके जन्म जन्मान्तर के कष्टों और पापों का नाश होता है
८. यदि कोई व्यक्ति विद्यालय या अस्पताल का निर्माण कराता है या बनाने में अपना योगदान देता है और उसकी सेवा करता है तो उसको सदबुद्घि और भगवत्कृपा मिलती है
लेकिन अपने नाम प्रचार के लिए या स्वार्थ पूर्ति के लिए जो उपरोक्त कार्य करता है, अहंकार करता है तो सभी कर्म निष्फल हो जाते हैं !