Tuesday, 19 November 2024

ज्योतिष शास्त्र में सोना, चांदी, तांबा या लोहा किस पाए में हुआ है आपका जन्म

ज्योतिष शास्त्र में सोना, चांदी, तांबा या लोहा किस पाए में हुआ है आपका जन्म 
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क्या होते हैं पाये और कौन सा पाया माना जाता है शुभ?
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कुछ लोगों ने अपने बड़े बुजुर्ग या पंडितों से पैरों के तांबे, चांदी, सोने या लोहे के होने की बात सुनी होगी। इसका मतलब आपकी कुंडली से है। कुंडली में लग्न से चंद्रमा किस भाव में है उससे पाये का पता चलता है। मनुष्य की कुंडली में 12 भाव होते हैं जिन्हें चार भागों में बांटा गया है। प्रत्येक भाव को पाया, पाद या पैर कहते हैं। ये चार पाये हैं सोने का पाया, चांदी का पाया, तांबे का पाया और लोहे का पाया। इन्हीं पायों में से एक पाया किसी ना किसी व्यक्ति का होता है।

चांदी का पाया 
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जिस व्यक्ति के जन्म के समय चंद्रमा दूसरे, पांचवे और नौवें घर में हो तो ऐसे लोगों का जन्म चांदी के पाए में माना जाता है। इस पाए में जन्म लेने वाले लोग काफी भाग्यशाली होते हैं। कहा जाता है ऐसे लोग अपने साथ-साथ घरवालों के लिए भी काफी लकी साबित होते हैं। इनके घर में जन्म लेते ही परिवार का मान-सम्मान बढ़ने लगता है और परिवार के लोगों की तरक्की होती है।

तांबे का पाया 
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इसे पाये को दूसरे नंबर का श्रेष्ठ माना गया है। जब किसी बालक के जन्म के समय चंद्रमा तीसरे, सांतवे और दसवें भाग में हो तब उसे तांबे का पाया माना जाता है। इस पाये में जन्मा बच्चा पिता के लिए काफी भाग्यशाली होता है। इसके घर में आने से घर की सुख सुविधा में वृद्धि होने लगती है।

सोने का पाया 
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जन्म लग्न से चंद्रमा यदि पहले, छठे और ग्यारहवें भाव में हो तो उसे सोने का पाया कहा जाता है। इस पाये में जन्म लेने वाले लोगों को सुख-सुविधा बड़ी ही कठिनाईयों से मिलती है। ऐसे लोग रोग की चपेट में भी बहुत जल्दी आ जाते हैं। इन लोगों के लिए सोने का दान करना अच्छा माना गया है।

लोहे का पाया  
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इस पाये को इतना अच्छा नहीं माना गया है। जब चंद्रमा चौथे, आठवें या बारहवें भाव में हो तो ऐसे बच्चे का जन्म लोहे के पाये में माना जाता है। ऐसे लोगों के जीवन में काफी संघर्ष होता है। पारिवार में कोई ना कोई परेशानी आने लगती है। खासकर पिता के लिए ऐसे लोग काफी कष्टदायक साबित होते हैं।
ज्योतिषाचार्य  शालिनी मल्होत्रा 
9910057645

Monday, 18 November 2024

ग्रहो क़े रत्न पहनना

ग्रहो क़े रत्न पहनना।                         

रत्न ग्रहो की शक्ति को बढ़ाकर उनसे मिलने वाले फलों में वृद्धि करता है।यदि कोई ग्रह जन्मकुंडली में कमजोर है, अस्त है या अनुकूल फल देने वाला होकर पीड़ित जिस कारण वह ग्रह अपने पूर्ण शुभ फल नही दे पाता है तो ऐसे ग्रह के सही रत्न पहनकर उसको बलवान करके उस ग्रह से लाभ और कार्य पूर्ति की जा सकती है।अच्छा अब कभी कभी ग्रहो के रत्न काम नही करते या थोड़ा ही फायदा दे पाते है जबकि रत्न ओरिजिनल ही होता है।

ऐसा इस कारण होता है क्योंकि जिस ग्रह का रत्न पहना है यदि वह अशुभ योग बनाकर कुंडली मे बेठा है तब वहां रत्न के साथ साथ उस ग्रह का पूजा पाठ और जप या दान आदि जैसे उपाय जातक को स्वयम करने होते जिससे उस ग्रह ने जो दोष बना रखा है वह कम हो और रत्न लाभ दे क्योंकि कोई भी रत्न किसी भी ग्रह के अशुभ योग या दोष को कम नही करता केवल उस ग्रह की शक्ति को बढ़ाकर फलो में वृद्धि करता है।

यदि ग्रह दोष युक्त नही है अच्छी स्थिति में कुंडली मे बेठा है लेकिन सर्फ कमजोर होने से वह ज्यादा शुभ फल नही दे पा रहा है तब केवल उस ग्रह का रत्न पहनना ही लाभ दे देगा क्योंकि ग्रह कमजोर है अशुभ नही, लेकिन ग्रह कमजोर हो और अशुभ स्थिति या योग में हो और कुंडली का अनुकूल ग्रह है तब यहाँ उस ग्रह के रत्न के साथ साथ, पूजा पाठ, जप, दान करने पर ही रत्न लाभ देगा।इस तरह सही तरह से कुंडली मे ग्रहो की स्थिति की जांच करके रत्न धारण करे जायेगे तब बहुत बढ़िया लाभ और सफलता देगे।कुछ 

उदाहरणों से समझे।                                                                       

उदाहरण1:- 
कर्क लग्न में मंगल प्रबल योग कारक होकर बेहद शुभ फल देने वाला होता है क्योंकि यहाँ यह दो शुभ भाव 5वे और 10वे भाव का स्वामी होता है।तब अब मंगल यदि यहाँ तीसरे भाव मे नबमेंश गुरु के साथ युति बनाकर बैठे तो बहुत अच्छी स्थिति में राजयोग बनाकर बेठा है गुरु मंगल दोनो ही ग्रह यहाँ राजयोग और सफलता देने वाले है।लेकिन तीसरे भाव मे मंगल और गुरु दोनो ही कन्या राशि जो कि इन दोनों ग्रहो की शत्रु राशि है इस कारण दोनो इस राशि और भाव मे शत्रु राशि मे होने से कमजोर है इनको बल देना जरूरी है यहाँ मंगल के लिए त्रिकोणी मूंगा और गुरु के लिए पुखराज/सुनहला पहनना दोनो ग्रहो के बल में वृद्धि करेगा और भाग्योन्नति, सफलता, प्रबल उन्नति देकर राजयोग, सम्मानित जीवन की उचाईयो तक जातक को लेकर जायेगे मंगल गुरु।।                         

अब यहाँ मंगल और गुरु के साथ राहु बेठ जाए तब यहाँ गुरु चांडाल योग+अंगारक योग बनेगा ऐसी स्थिति में यहाँ राहु केतु की शांति पूजा, जप आदि से करने पर गुरु मंगल के रत्न ज्यादा लाभ देंगे क्योंकि दो अशुभ योग बनने से मंगल गुरु राहु के अशुभ प्रभाव से दूषित है तब ऐसी स्थिति में रत्न ज्यादा लाभ तब ही देते है जब साथ बैठे अशुभ ग्रह/अशुभ योग की शांति की जाएगी।।                                             

उदाहरण2:- 
कोई ग्रह सप्तमेश है और सप्तमेश होकर शुभ स्थानगत है लेकिन कमजोर है तब विवाह के फल जैसे शादी होने में देर, सुख में कमी होगी तब ऐसे में सप्तमेश का रत्न भी धारण करके विवाह और दाम्पत्य जीवन सुख में वृद्धि की जा सकती है।जैसे कन्या लग्न में सप्तमेश गुरु है तो यहाँ गुरु केंद्र त्रिकोण में बैठने पर गुरु का रत्न पहनकर गुरु को शादी के लिए बलि किया जा सकता है।।                                                                                                     

किसी भी ग्रह के रत्न बिना ज्योतिषीय सलाह लिए नही पहने, क्योंकि ग्रह यदि मारक या अशुभ भावेश है जैसे 2, 6, 8, 12 या तीसरे भाव का अकेला स्वामी है साथ कोई ग्रह नीच राशि का भी है तब रत्न ऐसी स्थिति में नुकसान भी दे देगा, इस कारण रत्न हमेशा सलाह लेकर ही धारण किये जाते है।तब ही वह सही लाभ दे सकते है।।                                                                                                    

यदि उचित और सही तरह से ग्रहो की कुंडली अनुसार शुभ/अशुभ स्थिति जांचकर रत्न धारण करने से ग्रहो के शुभ फल जैसे, किसी काम मे सफलता, उन्नति, भाग्य का साथ, शादी सुख आदि में वृद्धि करके फायदा लिया जा सकता है।

कुंडली में मंगल कब शुभ फलदायक होता है।

कुंडली में मंगल कब शुभ फलदायक होता है।

कुंडली में मंगल शुभ फलदायक तब माना जाता है, जब यह कुछ विशेष राशियों में या कुछ विशेष भावों में स्थित हो। मंगल साहस, ऊर्जा, शक्ति, और आत्म-विश्वास का प्रतीक होता है। यह व्यक्ति को मेहनती, दृढ़निश्चयी और साहसी बनाता है। जब मंगल शुभ स्थिति में होता है, तो व्यक्ति के जीवन में सफलता, मान-सम्मान और आत्म-विश्वास का संचार होता है। यहाँ बताया गया है कि किस स्थिति में मंगल शुभ फलदायक हो सकता है:

मंगल की शुभ राशियाँ:

1. मेष (Aries) - मंगल अपनी ही राशि मेष में उच्च का होता है। यह स्थिति व्यक्ति को आत्मविश्वासी, साहसी, और निर्णायक बनाती है। ऐसे व्यक्ति जोखिम लेने से नहीं डरते और नेतृत्व में आगे रहते हैं।

2. मकर (Capricorn) - मकर राशि में मंगल उच्च का होता है, जो इसे अत्यंत शक्तिशाली बनाता है। यह स्थिति व्यक्ति को अनुशासनप्रिय, संगठित और मेहनती बनाती है। ऐसे लोग करियर में सफलता पाते हैं और अपने कार्यों में निपुण होते हैं।

3. वृश्चिक (Scorpio) - वृश्चिक में मंगल अपनी दूसरी स्व-राशि में होता है। यह व्यक्ति को मानसिक रूप से मजबूत, जिज्ञासु, और दृढ़ बनाता है। यह स्थिति जीवन में साहसी निर्णय लेने की क्षमता देती है, जो कठिन समय में सहायक होती है।

4. सिंह (Leo) - सिंह में मंगल व्यक्ति को नेतृत्व और ऊर्जावान बनाता है। ऐसे लोग आत्म-विश्वासी और सशक्त होते हैं और समाज में प्रतिष्ठा पाते हैं। मंगल की यह स्थिति व्यक्ति को रचनात्मक और निर्णायक बनाती है।

5. धनु (Sagittarius) - धनु में मंगल व्यक्ति को साहसी और सकारात्मक दृष्टिकोण वाला बनाता है। ऐसे लोग जीवन में साहसिक कदम उठाते हैं और बड़ी सोच रखते हैं। मंगल की यह स्थिति उन्हें जीवन में नई दिशाएँ खोजने और सच्चाई की खोज में प्रेरित करती है।

मंगल के शुभ भाव:

1. प्रथम भाव (1st House) - यहाँ मंगल व्यक्ति को शारीरिक रूप से मजबूत, आत्म-विश्वासी और साहसी बनाता है। ऐसे लोग अपने कार्यों में नेतृत्व करने वाले होते हैं और उनका व्यक्तित्व प्रभावशाली होता है।

2. दशम भाव (10th House) - दशम भाव करियर और समाज में प्रतिष्ठा का भाव है। यहाँ मंगल व्यक्ति को करियर में सफलता, मान-सम्मान और उच्च पद प्राप्त करने में सहायक होता है। ऐसे लोग मेहनती और अनुशासनप्रिय होते हैं और अपने कार्यक्षेत्र में उच्च पद प्राप्त करते हैं।

3. तृतीय भाव (3rd House) - यहाँ मंगल साहस और आत्म-विश्वास को बढ़ाता है। व्यक्ति में जोखिम लेने की क्षमता बढ़ती है और वे नई चुनौतियों का सामना करने के लिए सदैव तैयार रहते हैं।

4. एकादश भाव (11th House) - यह भाव इच्छाओं की पूर्ति और लाभ का होता है। यहाँ मंगल व्यक्ति को धन, सफलता, और सामाजिक संबंधों में लाभ प्राप्त करने में सहायक होता है।

5. चतुर्थ भाव (4th House) - यहाँ मंगल संपत्ति, वाहन, और सुख-सुविधाओं का लाभ प्रदान कर सकता है। यह स्थिति घर में शांति और स्थिरता देती है।

मंगल के शुभ होने के लक्षण:

• मजबूत आत्म-विश्वास और साहस।

• किसी भी कार्य में पूर्णता और मेहनत।

• विपरीत परिस्थितियों में भी धैर्य और आत्म-विश्वास बनाए रखना।

• नेतृत्व क्षमता और निर्णय लेने की ताकत।

• जीवन में साहसी कदम उठाने की प्रवृत्ति।

यदि कुंडली में मंगल इन शुभ राशियों और भावों में स्थित होता है, तो यह व्यक्ति को साहसी, अनुशासनप्रिय और आत्म-विश्वासी बनाता है, जिससे वे जीवन में सफलता की ऊंचाइयों तक पहुँच सकते हैं।

गोचर

गोचर 

जब आपका जन्म हुआ उस वक्त जो ग्रहों की स्थिति थी वह आपकी जन्म कुंडली हुई ।।

और अभी वर्तमान में जो ग्रहों की स्थिति है वह गोचर कहलाती है ।।।

अब गोचर कितना प्रभावी है इसको समझिए ।‌।

आमतौर पर गोचर की गणना हम चंद्र राशि से करते हैं।।

उदाहरण के तौर पर अगर किसी जातक के पंचम भाव में मेष राशि का बृहस्पति बैठा है और गोचर में भी बृहस्पति जब पंचम भाव में मेष राशि में जब भ्रमण करेंगे तो जातक को शिक्षा और संतान का सुख दिलाएंगे क्योंकि पंचम भाव शिक्षा और संतान का होता है ।।।

चतुर्थ भाव घर का , आवास का होता है राशि से चतुर्थ भाव में जब बृहस्पति गोचर करेंगे तो जातक को मकान का सुख मिलेगा , जातक नई जमीन खरीदेगा, नया मकान बनाएगा, नई फ्लैट खरीदेगा ।।।

 अगर वही राशि से चतुर्थ भाव में शनि और राहु का गोचर करें तो जातक को घर छोड़ना पड़ेगा, गृह त्यागना पड़ेगा, घर में समस्याएं आएगी ।।।

 चतुर्थ में अगर शनि गोचर करें तो शनि की ढैया कहलाती है पारिवारिक क्लेश होता है ।।।

गोचर के उदाहरण को ऐसा समझिए ।।

आप बचपन में एक अमुक शहर में रहते थे, 20 वर्ष बाद उसी शहर में गए तो बचपन के दिन आपको याद आएंगे ।।

अगर आप किसी ऐसे स्थान पर गए हैं जहां आप कई वर्ष पूर्व जा चुके हैं तो उस स्थान पर जाने पर आपको उस पुराने दिनों के याद आएंगे ,जिस समय आप वहां निवास करते थे ।।।

 या फिर आप 90 के दशक की कोई संगीत सुनते हैं या अपने बचपन के दिनों के कोई संगीत सुनते हैं , संगीत आज सुन रहे हैं पर याद बचपन के दिनों के ताजा हो जाएंगे ।।।

गोचर के साथ भी यही हालात होती है, चुकी वह अपने ही स्थान पर वापस से भ्रमण करता है तो वह पुरानी यादों में खोकर इस चीज को वापस दिलाने की कोशिश करता है जिस भाव से वह संबंध रखता है ।।।

जैसे सप्तम भाव विवाह का होता है और जब गोचर में भी ग्रह सप्तम भाव में आ जाए या सप्तम भाव को देखे तो विवाह की स्थिति बनती है ।।।

सबसे तेज चलने वाला ग्रह चंद्रमा और सबसे धीमा चलने वाला ग्रह शनि है ।।।

इसलिए गोचर का विष्लेषण करते समय इस दोनों ग्रहों की विशेषता महत्वपूर्ण होती है ।।

शनि का गोचर जहां साढेसाती या ढैया कहलाती है, वहीं राशिफल हम चंद्रमा के गोचर से देखते हैं ।।।

इसके साथ ही बृहस्पति का गोचर पर विशेष ध्यान दिया जाता है बृहस्पति जहां गोचर करें उस स्थान पर विशेष शुभता लाता है ।।

इसके साथ ही अष्टमेश के गोचर पर विशेष ध्यान दीजिए अष्टमेश जहां गोचर करें वहां नुकसान करता है ।।।

लग्नेश अगर छठा अष्टम द्वादश भाव में गोचर करें शारीरिक कष्ट होता है और पंचम नवम दशम भाव में गोचर करें तो जातक उन्नति करता है ।।।

Wednesday, 11 September 2024

गीता श्लोक

श्लोक 41 
 योगसंन्यस्तकर्माणं ज्ञानसञ्छिन्नसंशयम्।,आत्मवन्तं न कर्माणि निबध्नन्ति धनञ्जय ॥41॥ 
 Description: 
 हे अर्जुन। कर्म उन लोगों को बंधन में नहीं डाल सकते जिन्होंने योग की अग्नि में कर्मों को विनष्ट कर दिया है और ज्ञान द्वारा जिनके समस्त संशय दूर हो चुके हैं वे वास्तव में आत्मज्ञान में स्थित हो जाते हैं।

Tuesday, 30 July 2024

श्रावण मास सुख-शांति व समृद्धि प्रयोग 〰️〰️🌼〰️〰️🌼🌼〰️〰️🌼〰️〰️

श्रावण मास सुख-शांति व समृद्धि प्रयोग 
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सामग्रीः पारद शिवलिंग, रुद्राक्ष, पारद मुद्रिका एवं रुद्राक्ष माला।

यह प्रयोग श्रावण के किसी भी सोमवार को प्रारंभ किया जा सकता है। यह सौभाग्य, बल, बुद्धि व मेधा, वृद्धि के लिए किया जाता है। इससे घर में आय के नवीन स्त्रोत बढ़ते हैं। परिवार में शांति का वातावारण बनता है।

प्रयोग विधि
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नित्य क्रिया से निवृत होकर पूर्व/उत्तर की ओर मुख कर पवित्र आसन पर बैठें। पूजन सामग्री में बिल्व पत्र, पुष्प, गुलाब जल, इत्र, यज्ञोपवीत, मिष्ठान, दूध, घी, शहद, शक्कर, फल, दीपक, पहले से ही अपने पास रख लें।

फिर आप शांतचित होकर पूजा स्थान पर बैठें। अब एक पात्र में शिवलिंग, रुद्राक्ष व पारद मुद्रिका स्थापित करें। फिर दही, दूध, शक्कर व घी और गुलाब जल मिश्रित कर ॐ नमः शिवाय मंत्र का जाप करते हुए इस पंचामृत को शिवलिंग पर अर्पित करें। तदन्तर साफ पानी से धोकर एक-एक विग्रह को अपने सामने बाजोट पर पुष्प अक आसन देकर विराजमान करें। इन तीनों परकेशर व अक्षत चढ़ाकर पुष्प चढ़ाएं, इत्र चढ़ाएं व शिवलिंग व यज्ञोपवीत चढ़ाएं। बिल्व पत्र समर्पित करें, फल चढ़ाएं सम्पूर्ण पूजा विधि करने तक ‘ॐ नमः शिवाय’ का जाप अनवरत करते रहें।

अब धूप-दीप दिखाएं दीपक प्रज्वलित कर अपनी मनोकामना सिद्धि की प्रार्थना करते हुए रुद्राक्ष की माला में निम्न वरदायी मंत्र का जाप 11 माला जप करें।

मंत्र 👉 ॐ रुद्राक्ष पशुपति नमः ||

मंत्र जाप के पश्चात शिव जी की आरती सम्पन्न करें व कुछ पुष्प लेकर भगवान शिव के चरणों में चढ़ाएं व दोनों हाथ जोड़कर भगवान शिव से मन ही मन प्रार्थना करें कि वे सभी पर अपनी कृपा दृष्टि करें।

अब शिवलिंग को पूजा स्थान में ही रहने दें। रुद्राक्ष को घर का कोई भी पुरुष पूर्ण सफलता एवं विजय के लिए धारण कर ले। मुद्रिका को स्त्री धारण कर ले जिससे अखंड सौभाग्य, लक्ष्मी, शांति घर में बनी रहे| निश्चय ही आने वाले दिनों में घर में परिवर्तन महसूस होगा।
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Wednesday, 1 May 2024

राहु के दुष्प्रभाव को दूर करने के लिए उपाय -

🎯 राहु के दुष्प्रभाव को दूर करने के लिए उपाय -

🎯राहु के दुष्प्रभाव से बचने के लिए नियमित रूप से मैडिटेशन करना चाहिए क्योंकि राहु हमारे मन को अशांत और व्याकुल बनाता है और मैडिटेशन से मन शांत होता है।
🎯अगर राहु कि वजह से कोई रोग आ गया है या आने वाला है तो आप अस्पताल जाइए और मरीजों को फल और दवाईयां आदि से मदद करें।

🎯राहु के दुस्प्रभाव से बचने के लिए पांच सुखे नारियल लेकर उनको सफ़ेद धागे में पिरो कर माला बना लें और मंगलवार रात को सिरहाने रखकर सोएं और बुधवार शाम को सूर्यास्त के समय जल प्रवाह कर दें और बिना पिछे मुडकर देखें घर आ जाएं।

🎯राहु के दुष्प्रभाव से बचने के लिए चाय पत्ती को लेकर दोनों हाथों की हथेलियों से आधे घंटे तक मसलें। इस चायपत्ती को सूर्यास्त के समय किसी सफाई कर्मचारी को दान कर दें।

🎯राहु के दुष्प्रभाव से बचने के लिए देसी दारू का दान करें लेकिन स्वयं सेवन न करें।

🎯काली उड़द 300 ग्राम साबुत काले बकरे को खिलाएं।

🎯18 मुली बुधवार को किसी हरिजन को दान दें या किसी मन्दिर में दान करें।हरे पत्ते गाय को खिलाएं।

🎯राहु की शीशे की (लीड की) मुर्ति बनवा कर एक ही दिन में राहु के 72000 मंत्रों का जाप करके मुर्ति को उसी दिन कपड़े सहित पानी में बहा दें।

🎯चांडाल दोष में राहु के 72000 और बृहस्पति के 76000 जाप कराएं। बृहस्पति की स्वर्ण कि मुर्ति बनवा कर जाप के बाद 41 दिन पुजा पाठ करने के बाद गले में धारण करें।

🎯बुधवार और शनिवार को घर के बाथरूम श्री राम जय राम जय जय राम करते हुए अच्छी तरह साफ सुथरा करें।

🎯तम्बाकू का दान किसी सफाई कर्मचारी को करें।

🎯राहु के दुष्प्रभाव से बचने हेतु घर में रामायण का पाठ नित्य प्रति करें।